आर्य समाज के संस्थापक: दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय


Famous People: Dayananda Saraswati Biography



महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय: (Biography of Dayananda Saraswati in Hindi)

महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती आधुनिक भारत के महान चिन्तक, समाज-सुधारक व देशभक्त थे। सरस्वती जी एक संन्यासी तथा एक महान चिंतक थे। उन्होंने वेदों की सत्ता को सदा सर्वोपरि माना था। इन्होने ही सबसे पहले 1876 में ‘स्वराज्य’ का नारा दिया जिसे बाद में लोकमान्य तिलक ने आगे बढ़ाया था।

Quick Info About founder of Arya Samaj Dayananda Saraswati in Hindi:

नाम दयानंद सरस्वती
जन्म तिथि 1824 फरवरी
जन्म स्थान मोरबी, गुजरात (भारत)
निधन तिथि 30 अक्टूबर 1883
उपलब्धि आर्य समाज के संस्थापक
उपलब्धि वर्ष

स्वामी दयानंद सरस्वती से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य: (Important Facts Related to Dayananda Saraswati)

  1. दयानंद सरस्वती का पूरा नाम महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती था यह आर्य समाज के प्रवर्तक और प्रखर सुधारवादी संन्यासी थे।
  2. अपनी बहिन की मृत्यु से अत्यन्त दु:खी होकर इन्होने संसार त्याग करने तथा मुक्ति प्राप्त करने का निश्चय था।
  3. दयानंद सरस्वती जे पिता का नाम करशनजी लालजी तिवारी और माता का नाम यशोदाबाई था।
  4. दयानंद सरस्वती को 14 वर्ष की उम्र तक उन्हें रुद्री आदि के साथ-साथ यजुर्वेद तथा अन्य वेदों के भी कुछ अंश कंठस्थ हो गए थे। वे व्याकरण के भी अच्छे ज्ञाता थे।
  5. वर्ष 1863 से 1875 ई. तक स्वामी जी देश का भ्रमण करके अपने विचारों का प्रचार करते रहें। उन्होंने वेदों के प्रचार करने का कार्य-भार संभाला था और इस काम को पूरा करने के लिए संभवत: 7 या 10 अप्रैल 1875 ई. को ‘आर्य समाज’ नामक संस्था की स्थापना की थी।
  6. महर्षि दयानन्द ने तत्कालीन समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों तथा अन्धविश्वासों और रूढियों-बुराइयों को दूर करने के लिए, निर्भय होकर उन पर आक्रमण किया था। इसके लिए वे ‘संन्यासी योद्धा’ भी कहलाए थे।
  7. वर्ष 1873 में ‘आर्योद्देश्यरत्नमाला’ नामक पुस्तक प्रकाशित हुई जिसमें स्वामी जी ने एक सौ शब्दों की परिभाषा वर्णित की है। इनमें से कई शब्द आम बोलचाल में आते हैं।
  8. वर्ष 1881 में स्वामी दयानन्द ने ‘गोकरुणानिधि’ नामक पुस्तक प्रकाशित की जो कि गोरक्षा आन्दोलन को स्थापित करने में प्रमुख भूमिका निभाने का श्रेय भी लेती है।
  9. लाला लाजपत राय ने कहा था की- स्वामी दयानन्द मेरे गुरु हैं उन्होंने हमे स्वतंत्रता पूर्वक विचारना , बोलना और कर्त्तव्यपालन करना सिखाया था।
  10. वर्ष 1883 में इन्हें दूध में कांच पीसकर पिला दिया जिससे इनका दुखद: देहांत हो गया। आज भी इनके अनुयायी देश में शिक्षा आदि का महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।
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