दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय | Biography of Dayananda Saraswati In Hindi

आर्य समाज के संस्थापक: दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय

महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय: (Biography of Dayananda Saraswati in Hindi)

महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती आधुनिक भारत के महान चिन्तक, समाज-सुधारक व देशभक्त थे। सरस्वती जी एक संन्यासी तथा एक महान चिंतक थे। उन्होंने वेदों की सत्ता को सदा सर्वोपरि माना था। इन्होने ही सबसे पहले 1876 में ‘स्वराज्य’ का नारा दिया जिसे बाद में लोकमान्य तिलक ने आगे बढ़ाया था। उन्होंने वैदिक विचारधाराओं को पुनर्जीवित करने की दिशा में काम किया। इसके बाद, दार्शनिक और भारत के राष्ट्रपति एस. राधाकृष्णन ने उन्हें “आधुनिक भारत के निर्माता” में से एक कहा, जैसा कि श्री अरबिंदो ने किया था।

स्वामी दयानंद सरस्वती के जीवन का संक्षिप्त विवरण:

नाम दयानंद सरस्वती
जन्म तिथि 1824 फरवरी 1824
जन्म स्थान मोरबी, गुजरात (भारत)
पिता का नाम करशनजी लालजी तिवारी
माता का नाम यशोदाबाई
निधन तिथि 30 अक्टूबर 1883
उपलब्धि आर्य समाज के संस्थापक
उपलब्धि वर्ष 1875

स्वामी दयानंद सरस्वती का प्रारम्भिक जीवन एवं शिक्षा:

दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फ़रवरी टंकारा में सन् 1824 में मोरबी (मुम्बई की मोरवी रियासत) के पास काठियावाड़ क्षेत्र (जिला राजकोट), गुजरात में हुआ था। उनका मूल नाम मूलशंकर था उनके पिता का नाम करशनजी लालजी तिवारी, और उनकी माँ का नाम यशोदाबाई था। जब वे आठ साल के थे, तब उनके पिता उन्हें शिव को प्रभावित करने के तरीके सिखाते थे क्योंकि उनके पिता भगवान शिव के अनुयायी थे और इसी कारण उन्हें उपवास रखने का महत्व भी सिखाया गया था। दयानंद सरस्वती ने 1845 से 1869 तक लगभग पच्चीस वर्ष एक भटकते हुए तपस्वी के रूप में बिताए। उन्होंने भौतिक वस्तुओं को त्याग दिया और आत्म-वंचना का जीवन व्यतीत किया, खुद को जंगलों में आध्यात्मिक धार्मिक सत्य की खोज के लिए समर्पित कर दिया

स्वामी दयानंद सरस्वती से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य:

  1. दयानंद सरस्वती का पूरा नाम महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती था यह आर्य समाज के प्रवर्तक और प्रखर सुधारवादी संन्यासी थे।
  2. अपनी बहिन की मृत्यु से अत्यन्त दु:खी होकर इन्होने संसार त्याग करने तथा मुक्ति प्राप्त करने का निश्चय था।
  3. दयानंद सरस्वती जे पिता का नाम करशनजी लालजी तिवारी और माता का नाम यशोदाबाई था।
  4. दयानंद सरस्वती को 14 वर्ष की उम्र तक उन्हें रुद्री आदि के साथ-साथ यजुर्वेद तथा अन्य वेदों के भी कुछ अंश कंठस्थ हो गए थे। वे व्याकरण के भी अच्छे ज्ञाता थे।
  5. वर्ष 1863 से 1875 ई. तक स्वामी जी देश का भ्रमण करके अपने विचारों का प्रचार करते रहें। उन्होंने वेदों के प्रचार करने का कार्य-भार संभाला था और इस काम को पूरा करने के लिए संभवत: 7 या 10 अप्रैल 1875 ई. को ‘आर्य समाज’ नामक संस्था की स्थापना की थी।
  6. आर्यसमाज के नियम और सिद्धांत प्राणिमात्र के कल्याण के लिए है। संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना है।
  7. महर्षि दयानन्द ने तत्कालीन समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों तथा अन्धविश्वासों और रूढियों-बुराइयों को दूर करने के लिए, निर्भय होकर उन पर आक्रमण किया था। इसके लिए वे ‘संन्यासी योद्धा’ भी कहलाए थे।
  8. वर्ष 1873 में ‘आर्योद्देश्यरत्नमाला’ नामक पुस्तक प्रकाशित हुई जिसमें स्वामी जी ने एक सौ शब्दों की परिभाषा वर्णित की है। इनमें से कई शब्द आम बोलचाल में आते हैं।
  9. वर्ष 1881 में स्वामी दयानन्द ने ‘गोकरुणानिधि’ नामक पुस्तक प्रकाशित की जो कि गोरक्षा आन्दोलन को स्थापित करने में प्रमुख भूमिका निभाने का श्रेय भी लेती है।
  10. लाला लाजपत राय ने कहा था की- स्वामी दयानन्द मेरे गुरु हैं उन्होंने हमे स्वतंत्रता पूर्वक विचारना , बोलना और कर्त्तव्यपालन करना सिखाया था।
  11. वर्ष 1883 में इन्हें दूध में कांच पीसकर पिला दिया जिससे इनका दुखद: देहांत हो गया। आज भी इनके अनुयायी देश में शिक्षा आदि का महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।
  12. स्वामी दयानन्द के प्रमुख अनुयायियों में लाला हंसराज ने 1886 में लाहौर में ‘दयानन्द एंग्लो वैदिक कॉलेज’ की स्थापना की तथा स्वामी श्रद्धानन्द ने 1901 में हरिद्वार के निकट कांगड़ी में गुरुकुल की स्थापना की।
  13. स्वामी दयानन्द सरस्वती ने कई धार्मिक व सामाजिक पुस्तकें अपनी जीवन काल में लिखीं। प्रारम्भिक पुस्तकें संस्कृत में थीं, किन्तु समय के साथ उन्होंने कई पुस्तकों को आर्यभाषा (हिन्दी) में भी लिखा, क्योंकि आर्यभाषा की पहुँच संस्कृत से अधिक थी। हिन्दी को उन्होंने ‘आर्यभाषा’ का नाम दिया था। उत्तम लेखन के लिए आर्यभाषा का प्रयोग करने वाले स्वामी दयानन्द अग्रणी व प्रारम्भिक व्यक्ति थे।
  14. रोहतक में महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, अजमेर में महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, जालंधर में डीएवी विश्वविद्यालय का नाम उनके नाम पर रखा गया है। और इसके अतिरिक्त उद्योगपति नानजी कालिदास मेहता ने महर्षि दयानंद विज्ञान महाविद्यालय का निर्माण किया और इसे स्वामी दयानंद सरस्वती के नाम पर रखने के बाद पोरबंदर की एजुकेशन सोसायटी को दान कर दिया था।
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महत्वपूर्ण प्रश्न और उत्तर (FAQs):

  • प्रश्न: दयानंद सरस्वती को कितनी वर्ष की उम्र तक रुद्री आदि के साथ-साथ यजुर्वेद तथा अन्य वेदों के भी कुछ अंश कंठस्थ हो गए थे?
    उत्तर: 14 वर्ष
  • प्रश्न: आर्य समाज के संस्थापक कौन थे?
    उत्तर: स्वामी दयानंद सरस्वती
  • प्रश्न: आर्योद्देश्यरत्नमाला नामक पुस्तक प्रकाशित हुई थी?
    उत्तर: 1873
  • प्रश्न: वर्ष 1881 में स्वामी दयानन्द ने कौन-सी पुस्तक प्रकाशित की जो कि गोरक्षा आन्दोलन को स्थापित करने में प्रमुख भूमिका निभाने का श्रेय भी लेती है?
    उत्तर: गोकरुणानिधि
  • प्रश्न: दयानंद सरस्वती की मृत्यु किस वजह से हुई थी?
    उत्तर: कांच पीसकर पिलाने से
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