लिंगराज मंदिर, भुवनेश्वर (ओडिशा)


Famous Things: Lingaraja Temple Bhubaneswar Odisha Gk In Hindi



लिंगराज मंदिर, भुवनेश्वर (ओडिशा) के बारे में जानकारी: (Lingaraja Temple, Bhubaneswar (Odisha) GK in Hindi)

लिंगराज मंदिर पूर्वी भारतीय राज्य ओडिशा (पूर्व उड़ीसा) की राजधानी भुवनेश्‍वर में स्‍थित एक प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर है। ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर को मंदिरों का शहर कहा जाता है और लिंगराज महादेव मंदिर शहर का सबसे बड़ा मंदिर है। इसकी मदिर वास्तुशिल्पीय बनावट इतनी उत्कृष्ट और शानदार है कि यहां पर सालभर पर्यटक और श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता हैं। यह भारत के कुछ बेहतरीन गिने चुने हिंदू मंदिरों में से एक है।

लिंगराज मंदिर का संक्षिप्त विवरण: (Quick Info about Lingaraja Temple)

स्थान भुवनेश्वर, ओडिशा (भारत)
निर्माण तिथि 1090-1104 ई. (वर्तमान स्वरूप)
निर्माता ललाटेडुकेशरी (प्रारम्भिक निर्माण)
वास्तुकला शैली कलिंग वास्तुकला
प्रकार हिन्दू मंदिर
मुख्य देवता भगवान शिव

लिंगराज मंदिर का इतिहास: (Lingaraja Temple History in Hindi)

फ़र्ग्युसन के अनुसार इस भव्य मंदिर का निर्माण ललाटेडुकेशरी द्वारा 617-657 ई. के मध्य करवाया गया था। मंदिर को वर्तमान स्वरूप 1090 से 1104 ई. मध्य दिया गया था। मंदिर के प्रार्थना कक्ष, मुख्य मंदिर और टावर का निर्माण 11वीं शताब्दी में किया गया, जबकि भोग-मंडप का निर्माण 12वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर के कुछ हिस्से 1400 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं, इस मंदिर का वर्णन छठी शताब्दी के लेखों में भी मिलता है। वास्‍तुकला की दृष्‍टि से लिंगराज मंदिर उड़ीसा के अन्‍य मंदिरों जैसा नजर ही आता है। बाहर से देखने पर मंदिर चारों ओर से फूलों के मोटे गजरे से सजा हुआ प्रतीत होता है, पूरे मंदिर में बेहद उत्कृष्ट नक्काशी की गई है।

मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा (मान्यता):

इस मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यता है कि लगभग हजार साल पुराने लिट्टी और वसा नाम दो भयंकर राक्षसों का वध भगवान शिव की पत्नी देवी पार्वती द्वारा यहीं पर किया गया था। युद्ध समाप्ति के बाद जब माता पार्वती को प्यास लगी तो भगवान शिव ने कुआं बना कर सभी नदियों का आह्वान किया। यहीं पर बिन्दूसागर नाम एक तालाब भी है तथा उसके पास ही लिंगराज का विशालकाय मन्दिर स्थापित है।

लिंगराज मंदिर के बारे में रोचक तथ्य: (Interesting Facts about Lingaraja Temple in Hindi)

  • भुवनेश्वर में बने इस भव्य मंदिर का प्रांगण 150 मीटर वर्गाकार है और इसके कलश की ऊंचाई 40 मीटर है।
  • शिखर भारतीय मन्दिरों के शिखरों के विकास क्रम में प्रारम्भिक अवस्था का शिखर माना जाता है, जिसकी ऊंचाई 180 फुट है। यह शिखर नीचे तो प्रायः सीधा तथा समकोण है किन्तु ऊपर पहुँचकर धीरे-धीरे वक्र होता चला गया है और शीर्ष पर प्रायः वर्तुल दिखाई देता है।
  • कलिंग वास्तुकला में बना यह मन्दिर उत्तरी भारतीय राज्यों के मन्दिरों में सौंदर्य रचना तथा अलंकरण की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
  • मंदिर के प्रांगण में 64 छोटे-छोटे मंदिर बने हैं, जिनकी संख्या पहले 108 थी।
  • वैसे तो यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है, लेकिन शालिग्राम के रूप में भगवान विष्‍णु भी यहां विराजमान हैं।
  • भगवान गणेश, कार्तिकेय तथा गौरी के तीन छोटे मन्दिर भी मुख्य मन्दिर के विमान से संलग्न हैं। मंदिर परिसर के उत्तर दिशा में गौरी मन्दिर में माता पार्वती की काले पत्थर की बनी मूर्ति स्थापित है।
  • इस मंदिर में स्‍थापित मूर्तियां चारकोलिथ पत्‍थर की बनी हुई हैं, जिनकी चमक आज भी फीकी नहीं पड़ी हैं। मंदिर की दीवारों पर खजुराहों के मंदिरों जैसी मूर्तियां उकेरी गई हैं।
  • वही मंदिर के भोग मंडप के बाहरी हिस्से पर मानव और जानवर को सम्भोग करते हुए दिखाया गया है, जो मनुष्य के रहस्य को दर्शाते है।
  • इस मंदिर के दायीं तरफ एक छोटा-सा कुआं भी है, इसे लोग मरीची कुंड कहते हैं। स्‍थानीय लोगों का ऐसा माना है कि इस कुंड के जल से स्‍नान करने से महिलाओं का बाझंपन दूर हो जाता है।
  • इस मंदिर का मुख्य त्यौहार फाल्गुन के महीने में मनाया जाने वाला शिवरात्रि है, जिसे लाखों की संख्या में श्रद्धालु एक साथ मिलकर मनाते हैं। वर्ष 2012 में प्राप्त जानकारी के अनुसार शिवरात्रि के दिन यहाँ तक़रीबन 2,00,000 श्रद्धालु आए थे। इसके साथ ही चंदन यात्रा नामक 22 दिनों तक चलने वाला त्यौहार भी मंदिर में मनाया जाता है।
  • गैर-हिंदू संप्रदाय के लोगो का मंदिर में प्रवेश वर्जित है, हालांकि मंदिर के एक हिस्से ऊंचा चबूतरा बना हुआ है, जिससे दूसरे धर्म के लोग भी मंदिर को देख सकें।
  • मंदिर के आस-पास 30-40 छोटे-छोटे मंदिर भी हैं, लेकिन 8वीं शताब्‍दी के आसपास चतुर्भुजाकार में निर्मित ‘वैताल’ मंदिर इनमें विशेष महत्‍व रखता है। इस मंदिर में चामुंडा देवी की मूर्ति स्‍थापित है। इस मंदिर में तांत्रिक, बौद्ध तथा वैदिक परम्‍परा सभी के लक्षण एक साथ देखने को मिलता है।
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