भारत के संविधान में किए गए प्रमुख संशोधनों की सूची


General Knowledge: Amendment Of Indian Constitution In Hindi
Bharat Ke Sanvidhaan Mein Kie Gae Pramukh Sanshodhanon Ki Suchi


भारतीय संविधान के संशोधन:  (Amendment of Indian Constitution in Hindi)

संविधान संशोधन किसे कहते है?

विधायिनी सभा में किसी विधेयक में परिवर्तन, सुधार अथवा उसे निर्दोष बनाने की प्रक्रिया को ‘संशोधन’ कहा जाता है। भारतीय संविधान का संशोधन भारत के संविधान में परिवर्तन करने की प्रक्रिया है। इस तरह के परिवर्तन भारत की संसद के द्वारा किये जाते हैं।

इन्हें संसद के प्रत्येक सदन से पर्याप्त बहुमत के द्वारा अनुमोदन प्राप्त होना चाहिए और विशिष्ट संशोधनों को राज्यों के द्वारा भी अनुमोदित किया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया का विवरण संविधान के लेख 368, भाग XX में दिया गया है।

संविधान संशोधन की प्रक्रिया:

संविधान के भाग-20 के अंतर्गत अनुच्छेद-368 में संविधान संशोधन से संबंधित प्रक्रिया के बारे विस्तृत जानकरी उपलब्ध है। संविधान के संशोधन हेतु किसी विधेयक को संसद में पुनः स्थापित करने हेतु राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक नहीं है। संविधान में संशोधन की प्रक्रिया की दृष्टि से भारतीय संविधान के अनुच्छेदों को निम्नलिखित तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. वे अनुच्छेद, जिन्हें संसद में साधारण बहुमत से संशोधित किया जा सकता है।
  2. वे अनुच्छेद, जिन्हें संसद में दो-तिहाई (⅔) बहुमत से संशोधित किया जा सकता है।
  3. वे अनुच्छेद, जिन्हें संसद में दो-तिहाई (⅔) बहुमत के साथ भारत के आधे राज्यों के विधान्मंदलों के संकल्पों की स्वीकृति द्वारा संशोधित किया जा सकता है।

अनुच्छेद-368 के अनुसार संसद संविधान में संशोधन तीन प्रकार से ला सकती है:

  1. साधारण बहुमत द्वारा
  2. दो-तिहाई बहुमत द्वारा
  3. दो-तिहाई बहुमत के साथ देश के आधे राज्यों के विधानमण्डलों की स्वीकृति से।
  • संशोधन अधिनियम पर दोनों सदनों में गतिरोध उत्पन्न होने पर संयुक्त अधिवेशन का प्रावधान नहीं है।
  • पारित संशोधन अधिनियम पर अपनी स्वीकृति प्रदान करने हेतु राष्ट्रपति बाध्य है।
  • मौलिक अधिकारों में संशोधन सम्भव है जबकि संविधान के आधारिक लक्षणों में संशोधन नहीं किया जा सकता।
  • सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार आधारिक लक्षणों की संख्या 19 है।

संविधान में अब तक किए गए संशोधनो की सूची:

  • पहला संविघान (संशोधन) अधिनियम (1951): इसके माध्यम से स्वतंत्रता, समानता एवं संपत्ति से संबंधित मौलिक अधिकारों को लागू किए जाने संबंधी कुछ व्यवहारिक कठिनाइयों को दूर करने का प्रयास किया गया। भाषण एवं अभिव्यक्ति के मूल अधिकारों पर इसमें उचित प्रतिबंध की व्यवस्था की गई। साथ ही, इस संशोधन द्वारा संविधान में नौंवी अनुसूची को जोड़ा गया, जिसमें उल्लिखित कानूनों को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्तियों के अंतर्गत परीक्षा नहीं की जा सकती है।
  • दूसरा संविघान (संशोधन) अधिनियम (1952): इसके अंतर्गत 1951 की जनगणना के आधार पर लोक सभा में प्रतिनिधित्व को पुनर्व्यवस्थित किया गया।
  • तीसरा संविघान (संशोधन) अधिनियम (1954): अंतर्गत सातवीं अनुसूची को समवर्ती सूची की 33वीं प्रविष्टी के स्थान पर खाद्यान्न, पशुओं के लिए चारा, कच्चा कपास, जूट आदि को रखा गया, जिसके उत्पादन एवं आपूर्ति को लोकहित में समझने पर सरकार उस पर नियंत्रण लगा सकती है।
  • चौथा संविघान (संशोधन) अधिनियम (1955): इसके अंतर्गत व्यक्तिगत संपत्ति को लोकहित में राज्य द्वारा हस्तगत किए जाने की स्थिति में, न्यायालय इसकी क्षतिपूर्ति के संबंध में परीक्षा नहीं कर सकती।
  • पांचवा संविघान (संशोधन) अधिनियम (1955): इस संशोधन में अनुच्छेद 3 में संशोधन किया गया, जिसमें राष्ट्रपति को यह शक्ति दी गई कि वह राज्य विधान- मंडलों द्वारा अपने-अपने राज्यों के क्षेत्र, सीमाओं आदि पर प्रभाव डालने वाली प्रस्तावित केंद्रीय विधियों के बारे में अपने विचार भेजने के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित कर सकते हैं।
  • छठा संविघान (संशोधन) अधिनियम (1956): इस संशोधन द्वारा सातवीं अनुसूची के संघ सूची में परिवर्तन कर अंतर्राज्यीय बिक्री कर के अंतर्गत कुछ वस्तुओं पर केंद्र को कर लगाने का अधिकार दिया गया है।
  • 07वा संविघान (संशोधन) अधिनियम (1956): इस संशोधन द्वारा भाषीय आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया गया, जिसमें अगली तीन श्रेणियों में राज्यों के वर्गीकरण को समाप्त करते हुए राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में उन्हें विभाजित किया गया। साथ ही, इनके अनुरूप केंद्र एवं राज्य की विधान पालिकाओं में सीटों को पुनर्व्यवस्थित किया गया।
  • 08वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1959): इसके अंतर्गत केंद्र एवं राज्यों के निम्न सदनों में अनुसूचित जाती, अनुसूचित जनजाति एवं आंग्ल भारतीय समुदायों के आरक्षण संबंधी प्रावधानों को दस वर्षों अर्थात 1970 तक बढ़ा दिया गया।
  • 09वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1960): इसके द्वारा संविधान की प्रथम अनुसूची में परिवर्तन करके भारत और पाकिस्तान के बीच 1958 की संधि की शर्तों के अनुसार बेरुबारी, खुलना आदि क्षेत्र पाकिस्तान को दे दिए गए।
  • 10वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1961): इसके अंतर्गत भूतपूर्व पुर्तगाली अंतः क्षेत्रों दादर एवं नगर हवेली को भारत में शामिल कर उन्हें केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दे दिया गया।
  • 11वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1962): इसके अंतर्गत उपराष्ट्रपति के निर्वाचन के प्रावधानों में परिवर्तन कर, इस सन्दर्भ में दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन को बुलाया गया। साथ ही यह भी निर्धारित की निर्वाचक मंडल में पद की रिक्तता के आधार पर राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन को चुनौती नहीं दी जा सकती।
  • 12वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1962): इसके अंतर्गत संविधान की प्रथम अनुसूची में संशोधन कर गोवा, दमन एवं दीव को भारत में केंद्रशासित प्रदेश के रूप में शामिल कर लिया गया।
  • 13वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1962): इसके अंतर्गत नागालैंड के संबंध में विशेष प्रावधान अपनाकर उसे एक राज्य का दर्जा दे दिया गया।
  • 14वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1963): इसके द्वारा केंद्र शासित प्रदेश के रूप में पुदुचेरी को भारत में शामिल किया गया। साथ ही इसके द्वारा हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, गोवा, दमन और दीव तथा पुदुचेरी केंद्र शासित प्रदेशों में विधान पालिका एवं मंत्रिपरिषद की स्थापना की गई।
  • 15वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1963): इसके अंतर्गत उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवामुक्ति की आयु 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष कर दी गई तथा अवकाश प्राप्त न्यायाधीशों की उच्च न्यायालय में नियुक्ति से सबंधित प्रावधान बनाए गए।
  • 16वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1963): इसके द्वारा देश की संप्रभुता एवं अखंडता के हित में मूल अधिकारों पर कुछ प्रतिबंध लगाने के प्रावधान रखे गए साथ ही तीसरी अनुसूची में भी परिवर्तन कर शपथ ग्रहण के अंतर्गत ‘मैं भारत की स्वतंत्रता एवं अखंडता को बनाए रखूंगा’ जोड़ा गया।
  • 17वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1964): इसमें संपत्ति के अधिकारों में और भी संशोधन करते हुए कुछ अन्य भूमि सुधार प्रावधानों को नौवीं अनुसूची में रखा गया, जिनकी वैधता परीक्षा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नहीं की जा सकती थी।
  • 18वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1966): इसके अंतर्गत पंजाब का भाषीय आधार पर पुनर्गठन  करते हुए पंजाबी भाषी क्षेत्र को पंजाब एवं हिंदी भाषी क्षेत्र को हरियाणा के रूप में गठित किया गया। पर्वतीय क्षेत्र हिमाचल प्रदेश को दे दिए गए तथा चंडीगढ़ को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया।
  • 19वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1966): इसके अंतर्गत चुनाव आयोग के अधिकारों में परिवर्तन किया गया एवं उच्च न्यायालयों को चुनाव याचिकाएं सुनने का अधिकार दिया गया।
  • 20वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1966): इसके अंतर्गत अनियमितता के आधार पर नियुक्त कुछ जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति को वैधता प्रदान की गई।
  • 21वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1967): इसके द्वारा सिंधी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची के अंतर्गत पंद्रहवीं भाषा के रूप में शामिल किया गया।
  • 22वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1969): इसके द्वारा असम से अलग करके एक नया राज्य मेघालय बनाया गया।
  • 23वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1969): इसके अंतर्गत विधान पालिकाओं में अनुसूचित जाती एवं अनुसूचित जनजाति के आरक्षण एवं आंग्ल भारतीय समुदाय के लोगों का मनोनयन और दस वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया।
  • 24वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1971): इस संशोधन के अंतर्गत संसद की इस शक्ति को स्पष्ट किया गया की वह संशोधन के किसी भी भाग को, जिसमें भाग तीन के अंतर्गत आने वाले मूल अधिकार भी हैं संशोधन कर सकती है ,साथ ही यह भी निर्धारित किया गया कि संशोधन संबंधी विधेयक जब दोनों सदनों से पारित होकर राष्ट्रपति के समक्ष जाएगा तो इस पर राष्ट्रपति द्वारा संपत्ति दिया जाना बाध्यकारी होगा।
  • 26वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1971): इसके अंतर्गत भूतपूर्व देशी राज्यों के शासकों की विशेष उपाधियों एवं उनके प्रिवी पर्स को समाप्त कर दिया गया।
  • 27वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1971): इसके अंतर्गत मिजोरम एवं अरुणाचल प्रदेश को केंद्र शासित प्रदेशों के में स्थापित किया गया।
  • 29वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1972): इसके अंतर्गत केरल भू-सुधार (संशोधन) अधिनियम, 1969 तथा केरल भू-सुधार (संशोधन) अधिनियम, 1971 को संविधान की नौवीं अनुसूची में रख दिया गया, जिससे इसकी संवैधानिक वैधता को न्यायालय में चुनौती न दी जा सके।
  • 31वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1973): इसके द्वारा लोक सभा के सदस्यों की संख्या 525 से 545 कर दी गई तथा केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व 25 से घटकर 20 कर दिया गया।
  • 32वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1974): संसद एवं विधान पालिकाओं के सदस्य द्वारा दबाव में या जबरदस्ती किए जाने पर इस्तीफा देना अवैध घोषित किया गया एवं अध्यक्ष को यह अधिकार है कि वह सिर्फ स्वेच्छा से दिए गए एवं उचित त्यागपत्र को ही स्वीकार करे।
  • 34वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1974): इसके अंतर्गत विभिन्न राज्यों द्वारा पारित बीस भू सुधार अधिनियमों को नौवीं अनुसूची में प्रवेश देते हुए उन्हें न्यायालय द्वारा संवैधानिक वैधता के परीक्षण से मुक्त किया गया।
  • 35वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1974): इसके अंतर्गत सिक्किम का सरंक्षित राज्यों का दर्जा समाप्त कर उसे संबंद्ध राज्य के रूप में भारत में प्रवेश दिया गया।
  • 36वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1975): इसके अंतर्गत सिक्किम को भारत का बाइसवां राज्य बनाया गया।
  • 37वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1975): इसके तहत आपात स्थिति की घोषणा और राष्ट्रपति, राजयपाल एवं केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासनिक प्रधानों द्वारा अध्यादेश जारी किए जाने को अविवादित बनाते हुए न्यायिक पुनर्विचार से उन्हें मुक्त रखा गया।
  • 39वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1975): इसके द्वारा राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री एवं लोक सभाध्यक्ष के निर्वाचन संबंधी विवादों को न्यायिक परीक्षण से मुक्त कर दिया गया।
  • 41वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1976): इसके द्वारा राज्य लोकसेवा आयोग के सदस्यों की सेवा मुक्ति की आयु सीमा 60 वर्ष कर दी गई, पर संघ लोक सेवा आयोग के सदस्यों की सेवा निवृति की अधिकतम आयु 65 वर्ष रहने दी गई।
  • 42वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1976): इसके द्वारा संविधान में व्यापक परिवर्तन लाए गए, जिनमें से मुख्य निम्लिखित थे।
  • (क) संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ ‘धर्मनिरपेक्ष’ एवं ‘एकता और अखंडता’ आदि शब्द जोड़े गए।
  • (ख) सभी नीति निर्देशक सिद्धांतो को मूल अधिकारों पर सर्वोच्चता सुनिश्चित की गई।
  • (ग) इसके अंतर्गत संविधान में दस मौलिक कर्तव्यों को अनुच्छेद 51(क), (भाग-iv क) के अंतर्गत जोड़ा गया।
  • (घ) इसके द्वारा संविधान को न्यायिक परीक्षण से मुख्यत किया गया।
  • (ङ) सभी विधान सभाओं एवं लोक सभा की सीटों की संख्या को इस शताब्दी के अंत तक के स्थिर कर दिया गया।
  • (च) लोक सभा एवं विधान सभाओं की अवधि को पांच से छह वर्ष कर दिया गया,
  • (छ) इसके द्वारा यह निर्धारित किया गया की किसी केंद्रीय कानून की वैधता पर सर्वोच्च न्यायालय एवं राज्य के कानून की वैधता का उच्च न्यायालय परिक्षण करेगा। साथ ही, यह भी निर्धारित किया गया कि किसी संवैधानिक वैधता के प्रश्न पर पांच से अधिक न्यायधीशों की बेंच द्वारा दी तिहाई बहुमत से निर्णय दिया जाना चाहिए और यदि न्यायाधीशों की संख्या पांच तक हो तो निर्णय सर्वसम्मति से होना चाहिए।
  • (ज) इसके द्वारा वन संपदा, शिक्षा, जनसंख्या- नियंत्रण आदि विषयों को राज्य सूचि से समवर्ती सूची के अंतर्गत कर दिया गया।
  • (झ) इसके अंतर्गत निर्धारित किया गया कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद एवं उसके प्रमुख प्रधानमंत्री की सलाह के अनुसार कार्य करेगा।
  • (ट) इसने संसद को राष्ट्रविरोधी गतिविधियों से निपटने के लिए कानून बनाने के अधिकार दिए एवं सर्वोच्चता स्थापित की।
  • 44वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1978): इसके अंतर्गत राष्ट्रीय आपात स्थिति लागु करने के लिए आंतरिक अशांति के स्थान पर सैन्य विद्रोह का आधार रखा गया एवं आपात स्थिति संबंधी अन्य प्रावधानों में परिवर्तन लाया गया, जिससे उनका दुरुपयोग न हो। इसके द्वारा संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों के भाग से हटा कर विधेयक (क़ानूनी) अधिकारों की श्रेणी में रख दिया गया। लोक सभा तथा राज्य विधान सभाओं की अवधि 6 वर्ष से घटाकर पुनः 5 वर्ष कर दी गई। उच्चतम न्यायालय को राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति के निर्वाचन संबंधी विवाद को हल करने की अधिकारिता प्रदान की गई।
  • 50वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1984): इसके द्वारा अनुच्छेद 33 में संशोधन कर सैन्य सेवाओं की पूरक सेवाओं में कार्य करने वालों के लिए आवश्यक सूचनाएं एकत्रित करने, देश की संपत्ति की रक्षा करने और कानून तथा व्यवस्था से संबंधित दायित्व भी दिए गए। साथ ही, इस सेवाओं द्वारा उचित कर्तव्यपालन हेतु संसद को कानून बनाने के अधिकार भी दिए गए।
  • 52वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1985): इस संशोधन के द्वारा राजनितिक दल बदल पर अंकुश लगाने का लक्ष्य रखा गया। इसके अंतर्गत संसद या विधान मंडलों के उन सदस्यों को आयोग्य गोश्त कर दिया जाएगा, जो इस दल को छोड़ते हैं जिसके चुनाव चिन्ह पर उन्होंने चुनाव लड़ा था, पर यदि किसी दल की संसदीय पार्टी के एक तिहाई सदस्य अलग दल बनाना चाहते हैं तो उन पर अयोग्यता लागू नहीं होगी। दल बदल विरोधी इन प्रावधानों को संविधान की दसवीं अनुसूची के अंतर्गत रखा गया।
  • 53वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1986): इसके अंतर्गत अनुच्छेद 371 में खंड ‘जी’ जोड़कर मिजोरम को राज्य का दर्जा दिया गया।
  • 54वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1986): इसके द्वारा संविधान की दूसरी अनुसूची के भाग ‘डी’ में संशोधन कर न्यायाधीशों के वेतन में वृद्धि का अधिकार संसद को दिया गया।
  • 55वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1986): इसके अंतर्गत अरुणाचल प्रदेश को राज्य बनाया गया।

  • 56वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1987): इसके अंतर्गत गोवा को एक राज्य का दर्जा दिया गया तथा दमन और दीव को केंद्रशासित प्रदेश के रूप में ही रहने दिया गया।
  • 57वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1987): इसके अंतर्गत अनुसचित जनजातियों के आरक्षण के संबंध में मेघालय, मिजोरम, नागालैंड एवं अरुणाचल प्रदेश की विधान सभा सीटों का परिसीमन इस शताब्दी के अंत तक के लिए किया गया।
  • 58वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1987): इसके द्वारा राष्ट्रपति को संविधान का प्रामाणिक हिंदी संस्करण प्रकाशित करने के लिए अधिकृत किया गया।
  • 60वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1988): इसके अंतर्गत व्यवसाय कर की सीमा 250 रुपये से बढ़ाकर 2500 रुपये प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष कर दी गई।
  • 61वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1989): इसके द्वारा मतदान के लिए आयु सीमा 21 वर्ष से घटाकर 18 लेन का प्रस्ताव था।
  • 65वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1990): इसके द्वारा अनुच्छेद 338 में संशोधन करके अनुसूचित जाति तथा जनजाति आयोग के गठन की व्यवस्था की गई है।
  • 69वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1991): दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र बनाया गया तथा दिल्ली संघ राज्य क्षेत्र के लिए विधान सभा और मंत्रिपरिषद का उपबंध किया गया।
  • 70वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1992): दिल्ली और पुदुचेरी संघ राज्य क्षेत्रों की विधान सभाओं के सदस्यों को राष्ट्रपति के लिए निर्वाचक मंडल में सम्मिलित किया गया।
  • 71वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1992): आठवीं अनुसूची में कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली भाषा को सम्मिलित किया गया।
  • 73वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1992-93): इसके अंतर्गत संविधान में ग्याहरवीं अनुसूची जोड़ी गई। इसके पंचायती राज संबंधी प्रावधानों को सम्मिलित किया गया है।
  • 74वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1993): इसके अंतर्गत संविधान में बारहवीं अनुसूची शामिल की गई, जिसमें नगरपालिका, नगर निगम और नगर परिषदों से संबंधित प्रावधान किए गए हैं।
  • 76वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1994): इस संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान की नवीं अनुसूची में संशोधन किया गया है और तमिलनाडु सरकार द्वारा पारित पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में 69 प्रतिशत आरक्षण का उपबंध करने वाली अधिनियम को नवीं अनुसूची में शामिल कर दिया गया है।
  • 78वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1995): इसके द्वारा नवीं अनुसूची में विभिन्न राज्यों द्वारा पारित 27 भूमि सुधर विधियों को समाविष्ट किया गया है। इस प्रकार नवीं अनुसूची में सम्मिलित अधिनियमों की कुल संख्या 284 हो गई है।
  • 79वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (1999): अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण की अवधि 25 जनवरी 2010 तक के लिए बढ़ा दी गई है। इस संशोधन के माध्यम से व्यवस्था की गई कि अब राज्यों को प्रत्यक्ष केंद्रीय करों से प्राप्त कुल धनराशि का 29 % हिस्सा मिलेगा।
  • 82वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (2000): इस संशोधन के द्वारा राज्यों को सरकारी नौकरियों से आरक्षित रिक्त स्थानों की भर्ती हेतु प्रोन्नति के मामलों में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के अभ्यर्थियों के लिए न्यूनतम प्राप्ताकों में छूट प्रदान करने की अनुमति प्रदान की गई है।
  • 83वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (2000): इस संशोधन द्वारा पंचायती राज सस्थाओं में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण का प्रावधान न करने की छूट प्रदान की गई है। अरुणाचल प्रदेश में कोई भी अनुसूचित जाति न होने के कारन उसे यह छूट प्रदान की गई है।
  • 84वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (2001): इस संशोधन अधिनियम द्वारा लोक सभा तथा विधान सभाओं की सीटों की संख्या में वर्ष 2016 तक कोई परिवर्तन न करने का प्रावधान किया गया है।
  • 85वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (2001): सरकारी सेवाओं में अनुसूचित जाति जनजाति के अभ्यर्थियों के लिए पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था।
  • 86वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (2002): इस संशोधन अधिनियम द्वारा देश के 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने संबंधी प्रावधान किया गया है, इसे अनुच्छेद 21 (क) के अंतर्गत संविधान जोड़ा गया है। इस अधिनियम द्वारा संविधान के अनुच्छेद 51 (क) में संशोधन किए जाने का प्रावधान है।
  • 87वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (2003): परिसीमन में संख्या का आधार 1991 की जनगणना के स्थान पर 2001 कर दी गई है।
  • 88वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (2003): सेवाओं पर कर का प्रावधान
  • 89वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (2003): अनुसूचित जनजाति के लिए पृथक राष्ट्रीय आयोग की स्थापना की व्यवस्था।
  • 90वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (2003): असम विधान सभा में अनुसूचित जनजातियों और गैर अनुसूचित जनजातियों का प्रतिनिधित्व बरक़रार रखते हुए बोडोलैंड, टेरिटोरियल कौंसिल क्षेत्र, गैर जनजाति के लोगों के अधिकारों की सुरक्षा।
  • 91वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (2003): दल बदल व्यवस्था में संशोधन, केवल सम्पूर्ण दल के विलय को मान्यता, केंद्र तथा राज्य में मंत्रिपरिषद के सदस्य संख्या क्रमशः लोक सभा तथा विधान सभा की सदस्य संख्या का 15 प्रतिशत होगा (जहां सदन की सदस्य संख्या 40-50 है, वहां अधिकतम 12 होगी)।
  • 92वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (2003): संविधान की आंठवीं अनुसूची में बोडो, डोगरी, मैथली और संथाली भाषाओँ का समावेश।
  • 93वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (2005): शिक्षा संस्थानों में अनुसूचित जाति/जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के नागरिकों के दाखिले के लिए 25 प्रतिशत सीटों के आरक्षण की व्यवस्था, संविधान के अनुच्छेद 15 की धरा 4 के प्रावधानों के तहत की गई है।
  • 94वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (2006): इस अधिनियम के माध्यम से संविधान के अनुच्छेद-164(1) को संशोधित करके छत्तीसगढ़ और झारखण्ड में जनजातीय मामलों की देख-रेख हेतु पृथक् मंत्री की नियुक्ति का अनिवार्य प्रावधान किया गया है, जबकि बिहार को इससे बाहर कर दिया गया है। अब इस संशोधित सूची में ओडीशा, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश हैं, जहां जनजातीय मामलों की देखरेख हेतु पृथक मंत्री की नियुक्ति की जानी अनिवार्य है।
  • 95वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (2009): इस संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान के अनुच्छेद 334 में संशोधन किया गया है। इसके अंतर्गत लोक सभा एवं राज्य विधानसभाओं में आरक्षण की व्यवस्था को 10 वर्ष के लिए और आगे बढ़ा दिया गया है। 1999 के 79वें संविधान संशोधन द्वारा बढ़ाई 10 वर्ष की अवधि 25 जनवरी, 2010 को समाप्त हो गई। इससे पूर्व इसकी अवधि 10-10 वर्ष के लिए 8वें, 23वें, 45वें, 62वें एवं 79वें संविधान संशोधन द्वारा बढ़ाई जाती रही है।
  • 96वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (2011): इस संविधान संशोधन द्वारा संविधान की आठवीं अनुसूची [अनुच्छेद 344(1) और अनुच्छेद 351] में 15वें स्थान पर आने वाली भाषा उड़िया का नाम परिवर्तन कर ओडिया कर दिया गया है।
  • 97वां संविघान (संशोधन) अधिनियम (2011): इस अधिनियम को 12 जनवरी, 2012 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई। इसके द्वारा संविधान के भाग-III में अनुच्छेद 19 के खण्ड (1) के उपखण्ड (ग) में या संघ के बाद या सहकारी समितियां शब्द जोड़ा गया है। भाग-IV में अनुच्छेद 43ख जोड़ा गया है तथा भाग-9क के पश्चात् भाग-9ख जोड़ा गया है। इनमें सहकारी समितियों के गठन, विनियमन एवं विधि संबंधी प्रावधान किए गए हैं।

इन्हें भी पढे: भारतीय संविधान के भाग, अनुच्छेद एवं अनुसूचियों की सूची

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2 Comments:

  1. krishna patel sir management director

    very important constitution part of C.A.A.
    i like this site so very thanks

  2. Good ser

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