आनुवंशिकी-Genetics

आनुवंशिकी किसे कहते हैं? What is Genetics?

प्रत्येक जीव में बहुत से ऐसे गुण होते हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी माता-पिता अर्थात् जनकों से उनके संतानों में संचरित होते रहते हैं। ऐसे गुणों को आनुवंशिक गुण (Hereditary characters) या पैतृक गुण कहते हैं। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जीवों के मूल गुणों का संचरण आनुवंशिकता (Heredity) कहलाता है। मूल गुणों के संचरण के कारण ही प्रत्येक जीव के गुण अपने जनकों के गुण के समान होते हैं। इन गुणों का संचरण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जनकों के युग्मकों (Gametes) के द्वारा होता है। अतः जनकों से उनके संतानों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी युग्मकों के माध्यम से पैतृक गुणों का संचरण आनुवंशिकता कहलाता है।

आनुवंशिकी के जनक कौन है? Who is the father of genetics?

आनुवंशिकता एवं विभिन्नता (variations) का अध्ययन जीव-विज्ञान की जिस शाखा के अन्तर्गत किया जाता है, उसे आनुवंशिकी या जेनेटिक्स (Genetics) कहते हैं। ग्रेगर जॉन मेंडल (Gregor John Mendel) ने अपने वैज्ञानिक खोजों से आधुनिक आनुवंशिकी (Modern genetics) की नींव डाली। इसीलिए उन्हें आनुवंशिकी का पिता (Father of Genetics) भी कहा जाता है।

ग्रेगर जॉन मेंडल का संक्षित्प परिचय

ग्रेगर जॉन मेंडल का जन्म 22 जुलाई, 1822 को हुआ था ये एक जर्मन भाषी ऑस्ट्रियाई औगस्टेनियन पादरी एवं वैज्ञानिक थे। उन्हें आनुवांशिकी का जनक कहा जाता है। उन्होंने मटर के दानों पर प्रयोग कर आनुवांशिकी के नियम निर्धारित किए थे। उनके कार्यों की महत्ता बीसवीं शताब्दी तक नहीं पहचानी गई बाद में उन नियमों की पुनर्खोज ने उनका महत्व बताया।

ग्रेगर जॉन मेंडल का निधन 6 जनवरी, 1884 को हुआ जिसके सोलह वर्ष उपरान्त, विश्व को पता लगा कि वे कितने बड़े वैज्ञानिक थे। सन् 1900 में तीन यूरोपीय वैज्ञानिकों को उस भूले हुए लेख का पता चला था, जिसे 30 वर्ष पूर्व प्रकाशित किया था। उन्होंने उसकी महत्ता को जान लिया और उसका समाचार वैज्ञानिक दुनियां में फैला दिया।

मेंडल के आनुवंशिकता का नियम (Mendel’s laws of heredity)

मेंडल ने अपने प्रयोगों के लिए मटर के सात जोड़ी गुणों को चुना, जिनमें से प्रत्येक जोड़े का एक गुण प्रयोग के दौरान दूसरे गुण को दबाने की क्षमता रखता था। उन्होंने पहले को प्रभावी (Dominant) तथा दूसरे को अप्रभावी (Recessive) गुण कहा। मेंडल ने गुणों की वंशागति के लिए जिम्मेदार इन कारकों (Factors) को एक प्रतीक से व्यक्त किया। गुणों के जोड़ों में से उन्होंने प्रभावी लक्षण के कारक को अंग्रेजी के बड़े अक्षर (Capital letters) तथा अप्रभावी लक्षण के कारक को अंग्रेजी के छोटे अक्षर (small letters) से व्यक्त किया। जैसे- लम्बेपन के लिए “T” तथा बौनेपन के लिए ‘t ।

लक्षण (Characters) प्रभावी गुण (Dominant characters) अप्रभावी गुण (Recessive characters)
बीजों की आकृति गोल चिकना बीज झुर्रीदार बीज
बीजपत्र का रंग पीला बीजपत्र हरा बीजपत्र
पुष्प का रंग लाल सफेद
फली की आकृति चिकनी संकीर्णित
फली का रंग हरा पीला
पुष्प की स्थिति कक्षस्थ अग्रस्थ
पौधे की लम्बाई लम्बा बौना

मेंडल के अनुसार प्रत्येक जनन कोशिका में एक ही गुण को व्यक्त करने के लिए दो कारक (Factor) होते हैं। जब ये दोनों कारक समान हों, तो इस स्थिति को समयुग्मजी (Homozygous) तथा जब ये विपरीत हों, तो इस स्थिति को विषमयुग्मजी (Heterozygous) कहते हैं।

उदाहरण के लिए-

ТТ – समयुग्मजी (Homozygous)
Tt – विषमयुग्मजी (Heterozygous)

मेंडल ने पहले एक जोड़ी विपरीत गुणों और फिर दो जोड़ी विपरीत गुणों की वंशागति का अध्ययन किया, जिन्हें क्रमशः एकसंकरीय क्रॉस तथा द्धिसंकरीय क्रॉस कहा जाता है

एकसंकरीय क्रॉस (Monohybrid cross)

जब दो पौधों के बीच एक इकाई लक्षण के आधार पर संकरण कराया जाता है, तो इसे एकसंकरीय क्रॉस कहते हैं। एक संकरीय क्रॉस में मेंडल ने मटर के पौधों की दो ऐसी उपजातियाँ चुनी जिनके विपरीत लक्षणों के जोड़ों में एक लम्बा (Tall) तथा दूसरा बौना (Dwarf) था और इसका आपस में क्रॉस कराया तो देखा गया कि पहली पीढ़ी (F1 Generation) में बीजों द्वारा जो पौधे उत्पन्न हुए, वे सभी लम्बे थे। इन सभी पहली पीढ़ी वाले पौधों को F1 पौधे कहते हैं। F1 पीढ़ी से प्राप्त पौधों को उन्होंने फिर स्वपरागण (self pollination) द्वारा उगाया और पाया कि दूसरी पीढ़ी F2 में पाये जाने वाले लम्बे तथा नाटे पौधों का समलक्षणी अनुपात (Phenotypic ratio) 3 : 1 था।

इस प्रकार के अनुपात को एकसंकरीय अनुपात् (Monohybrid Ratio) भी कहते हैं। तीन लम्बे पौधों में एक शुद्ध लम्बा (Pure tall, TT) और दो मिश्रित या संकर लम्बे (Mixed or hybrid tall, Tt) थे। एक बौना पौधा जो F2 पीढ़ी से बना था, वह शुद्ध बौना था।

यदि हम F2 के पौधे से तीसरी पीढ़ी अर्थात् F3 प्राप्त करें तो देखेंगे कि शुद्ध लम्बे पौधे (TT) सदैव ही लम्बे पौधे बनाते हैं। इसी प्रकार शुद्ध बौने पौधे (tt) हमेशा ही बौने पौधे बनाते हैं परन्तु यदि मिश्रित लम्बे पौधे (Tt × Tt) का क्रॉस कराया जाए तो F, पीढ़ी की भाँति लम्बे तथा बौने पौधों का समलक्षणी अनुपात (Phenotypic ratio) 3 : 1 होगा।

  • F2 पीढ़ी के तीन लम्बे और एक बौने पौधे में एक शुद्ध लम्बा (TT), दो मिश्रित लम्बा (Tt) और एक शुद्ध बौना (tt) हुआ जिसका अनुपात 1 : 2 : 1 होता है। F3 शुद्ध लम्बे से क्रॉस कराने पर शुद्ध लम्बे पौधे ही प्राप्त होते हैं। जैसे-

TT × Tr → TT

  • F3 शुद्ध नाटे से क्रॉस कराने पर शुद्ध नाटे पौधे ही प्राप्त होते हैं। जैसे-

tt × tt → tt

  • लेकिन मिश्रित लम्बे (Tt) को मिश्रित लम्बे (rt) से क्रॉस कराने पर पुनः 3 : 1 के अनुपात में ही लम्बे और बौने (नाटे) पौधे प्राप्त होते हैं। इसमें-

TT – हमेशा शुद्ध लम्बा (Homozygous tall)

Tt — मिश्रित लम्बा (Heterozygous tall)

tt – हमेशा शुद्ध बौना (Homozygous dwarf)

इसका अनुपात

  • फीनोटिपिक अनुपात (Phenotypic ratio)- 3 :1 (3 लम्बा व 1 बौना)
  • जीनोटिपिक अनुपात (Genotypic ratio)- 1 : 2 : 1 (1 शुद्ध लम्बा, 2 मिश्रित लम्बा व 1 शुद्ध बौना)

द्धिसंकरीय क्रॉस Dihybrid Cross

द्धिसंकरीय क्रॉस दो अलग-अलग जीनों के बीच का एक क्रॉस होता है जो दो देखे गए लक्षणों में भिन्न होता है। मेंडल के कथन के अनुसार, इन दोनों एलील के युग्मों के बीच पूरी तरह से प्रमुख – आवर्ती लक्षणों का संबंध है। उदाहरण में, RRYY / rryy माता-पिता के परिणामस्वरूप F1 संतान होती है जो R और Y (RrYy) दोनों के लिए विषम हैं।

“डायहाइब्रिड क्रॉस” नाम में, “दी (Di)” इंगित करता है कि इसमें दो लक्षण शामिल हैं (जैसे R और Y), “हाइब्रिड (hybrid)” का अर्थ है कि प्रत्येक विशेषता के दो अलग-अलग एलील हैं (जैसे R और r, या Y और y), और “क्रॉस (Cross)” का अर्थ है कि दो व्यक्ति (आमतौर पर एक माँ और पिता) हैं जो अपनी आनुवंशिक जानकारी को जोड़ रहे हैं या “पार” कर रहे हैं।

डायहाइब्रिड क्रॉस 16 आयामों के एक पुननेट्ट वर्ग (Punnett square) का उपयोग करके कल्पना करना आसान है:

RY Ry rY ry
RY RRYY RRYy RrYY RrYy
Ry RRYy RRyy RrYy Rryy
rY RrYY RrYy rrYY rrYy
ry RrYy Rryy rrYy rryy

अर्धसूत्रीविभाजन के नियम, जैसा कि वे डायहाइब्रिड पर लागू होते हैं, मेंडेल के पहले नियम और मेंडल के दूसरे नियम में संहिताबद्ध होते हैं, जिन्हें क्रमशः अलगाव का नियम और स्वतंत्र वर्गीकरण का नियम भी कहा जाता है।

अलग-अलग गुणसूत्रों पर जीन के लिए, प्रत्येक एलील जोड़ी ने स्वतंत्र अलगाव दिखाया। यदि पहली फिलायल जनरेशन (F1 जनरेशन) चार समान संतान पैदा करती है, तो दूसरी फिलायल जनरेशन, जो पहली फिलायल जनरेशन के सदस्यों को पार करके होती है, एक फेनोटाइपिक (उपस्थिति) अनुपात 9: 3: 3: 1 दिखाती है, जहां-

  • 9 दोनों प्रमुख लक्षणों को प्रदर्शित करने वाले व्यक्तियों के अनुपात का प्रतिनिधित्व करता है-

RRYY + 2 x RRYy + 2 x RrYY + 4 x RrYy

  • पहले 3 में पहले प्रमुख गुण और दूसरा पुनरावर्ती गुण प्रदर्शित करने वाले व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है-

RRyy + 2 x Rryy

  • दूसरा 3 उन लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जो पहली बार आने वाले लक्षण और दूसरा प्रमुख लक्षण प्रदर्शित करते हैं-

rrYY + 2 x rrYy

  • 1, समवर्ती का प्रतिनिधित्व करता है, दोनों आवर्ती लक्षणों को प्रदर्शित करता है-

rryy

द्धिसंकरीय क्रॉस/ डायहाइब्रिड क्रॉस अनुपात = 9:3:3:1

जीनोटाइपिक (genotypic) अनुपात:  RRYY 1: RRYy 2: RRyy 1: RrYY 2: RrYy 4: Rryy 2: rrYY 1: rrYy 2: rryy 1.

मेंडल के नियम Mendel’s Law

एकसंकरीय क्रॉस (Monohybrid cross) एवं द्विसंकरीय क्रॉस (Dihybrid cross) के आधार पर मेंडल ने आनुवंशिकता सम्बन्धी कुछ नियमों का प्रतिपादन किया, जिसे मेंडल के आनुवंशिकता के नियम  (Mendel’s law of Inheritance) के नाम से जाना जाता है। इन नियमों में पहला एवं दूसरा एकसंकरीय क्रॉस के आधार पर तथा तीसरा नियम द्विसंकरीय क्रॉस के आधार पर आधारित है।

  1. प्रभाविकता का नियम (Law of Dominance): इसके अन्तर्गत मेंडल ने एक जोड़े के विपरीत लक्षणों को ध्यान में रखकर क्रॉस (Cross) कराया, तो प्रथम पीढ़ी में उपस्थित होने वाला लक्षण प्रभावी रहा। उदाहरणस्वरूप जब मटर के लम्बे पौधे से बौने पौधे का क्रॉस कराया गया तो प्रथम पीढ़ी में केवल लम्बे पौधे ही उगे। इससे नियमानुसार लम्बा प्रभावी (Dominance) तथा बौना अप्रभावी (Recessive) हुआ। इस नियम  को “मेंडल का प्रथम नियम” के नाम से भी जाना जाता है।
  2. मेंडल का पृथक्करण का नियम (Law of segregation): इस नियम के अनुसार युग्मकों के निर्माण के समय कारकों (जीन) के जोड़े के कारक अलग-अलग हो जाते हैं और इनमें से केवल एक कारक ही युग्मक में पहुँचता है। दोनों कारक एक साथ युग्मक में कभी नहीं जाते। इस नियम को युग्मकों की शुद्धता का नियम (Law of purity of gametes) भी कहा जाता है। जैसे- जब मटर के लम्बे पौधे का बौने पौधे से क्रॉस कराया जाता है, तो F1 पीढ़ी में केवल लम्बे पौधे ही उगते हैं, लेकिन पुनः जब इसी पीढ़ी के पुष्पों में स्वपरागण कराया जाता है तो F2 पीढ़ी के पौधे दोनों प्रकार के होते हैं। यहाँ लम्बे तथा बौने पौधे में 3 :1 का अनुपात पाया जाता है।
  3. स्वतन्त्रं अपव्यूहन का नियम (Law of independent assortment): इस नियम के अनुसार कारकों के विभिन्न जोड़े जो किसी जीव में पाये जाते हैं, एक-दूसरे के प्रति स्वतंत्र होते हैं और स्वतंत्रतापूर्वक मिश्रित होकर नए रंग-रूप के जीव बना सकते हैं। इस नियम को दयिसंकर का प्रयोग भी कहा जाता है।

जेनेटिक प्रयोग मेंडल ने मटर के पौधों के साथ किया, उन्हें आठ साल (1856-1863) लगे और उन्होंने 1865 में अपने परिणाम प्रकाशित किए। इस समय के दौरान, मेंडल 10,000 से अधिक मटर के पौधों की वृद्धि हुई, जो पूर्वजों की संख्या और प्रकार का ध्यान रखते थे। उनके समय में मेंडल के काम और उनके कानून की प्रशंसा नहीं की गई थी। यह 1900 तक नहीं था, अपने कानूनों के पुनर्वितरण के बाद, कि उनके प्रयोगात्मक परिणामों को समझा गया था।

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