गणगौर त्यौहार का अर्थ, इतिहास एवं महत्व पर निबंध


Inter National Days: Gangaur Festival In Hindi Essay [Post ID: 14428]



गणगौर के बारे में सामान्य ज्ञान: (Gangaur Festival Information in Hindi)

गणगौर पर्व:

भारत विश्व उन चुनिन्दा देशों में आता है, जिसमें सभी धर्म और जाती लोग आपस में मिल-जुलकर एक साथ रहते है। भारत के भिन्न-भिन्न राज्यों से वेशभूषा, रीति-रिवाजों और और वहां के  त्यौहारों से उनकी संस्कृति की झलक देखने की मिलती है।

देशभर में चैत्र शुक्ल तृतीया को गणगौर पर्व के रूप में मनाया जाता है। गणगौर पर्व चैत्र शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है, इसे गौरी तृतीया के नाम से भी जाना जाता हैं। हिन्दू धर्म में यह पर्व विशेष तौर पर केवल महिलओं के लिए ही होता है। इस दिन भगवान शिव ने पार्वतीजी को तथा पार्वतीजी ने समस्त स्त्री-समाज को सौभाग्य का वरदान दिया था। इस दिन सुहागिनें दोपहर तक व्रत रखती हैं। स्त्रियां नाच-गाकर, पूजा-पाठ कर हर्षोल्लास से यह त्योहार मनाती हैं।

वर्ष 2018 में गणगौर का त्यौहार कब मनाया जायेगा?

साल 2018 में गणगौर का त्यौहार 02 मार्च दिन (शुक्रवार) से शुरू होकर 20 मार्च दिन (मंगलवार) तक को मनाया जाएगा।

गणगौर पर्व का इतिहास और महत्व:

गणगौर का त्योहार आरंभ होली के दूसरे दिन से ही शुरू हो जाता है, जो पूरे 18 दिनों तक लगातार चलता रहेगा। गणगौर मारवाड़ीयों का बहुत बड़ा त्यौहार है जो हर साल बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है ना केवल, राजस्थान बल्कि हर वो प्रदेश जहा मारवाड़ी रहते है, इस त्यौहार को पूरे रीतिरिवाजों से मनाते है। गणगौर पूजन में कन्यायें और महिलायें अपने लिए अखंड सौभाग्य,  अपने पीहर और ससुराल की समृद्धि तथा गणगौर से हर वर्ष फिर से आने का आग्रह करती हैं।

होली के दूसरे दिन (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा) विवाहित और नवविवाहित महिलाएं प्रतिदिन गणगौर पूजती हैं और चैत्र शुक्ल द्वितीया (सिंजारे) के दिन किसी नदी, तालाब या सरोवर पर जाकर अपनी पूजी हुई गणगौरों को पानी पिलाती हैं। इसके बाद दूसरे दिन शाम को उनका विसर्जन कर देती हैं। यह व्रत विवाहित महिलाएं पति का प्‍यार और स्‍नेह पाने के लिए करती हैं। इस व्रत को करने से कुवांरी लड़कियों को उत्तम पति मिलता है और सुहागिनों का सुहाग अखण्ड रहता है। पूजा करते हुए दूब से पानी के छांटे देते हुए गोर गोर गोमती गीत गाती हैं।

यह माना जाता है कि माता गवरजा होली के दूसरे दिन अपने पीहर आती हैं तथा आठ दिनों के बाद ईसर (भगवान शिव) उन्हें वापस लेने के लिए आते हैं ,चैत्र शुक्ल तृतीया को उनकी विदाई होती है। इसलिए इस दिन को  गणगौर पर्व  के रूप में मनाया जाता है।

गणगौर की पूजा में गाये जाने वाले लोकगीत इस अनूठे पर्व की आत्मा हैं। इस पर्व में गवरजा और ईसर की बड़ी बहन और जीजाजी के रूप में गीतों के माध्यम से पूजा होती है तथा उन गीतों के बाद अपने परिजनों के नाम लिए जाते हैं। राजस्थान के कई प्रदेशों में गणगौर पूजन एक आवश्यक वैवाहिक रस्म के रूप में भी प्रचलित है।

पूजन सामग्री:

  • जिस तरह, इस पूजन का बहुत महत्व है उसी तरह, पूजा सामग्री का भी पूर्ण होना आवश्यक है ।
  • लकड़ी की चौकी/बाजोट/पाटा
  • ताम्बे का कलश
  • काली मिट्टी/होली की राख़
  • दो मिट्टी के कुंडे/गमले
  • मिट्टी का दीपक
  • कुमकुम, चावल, हल्दी, मेहन्दी, गुलाल, अबीर, काजल
  • घी
  • फूल,दुब,आम के पत्ते
  • पानी से भरा कलश
  • पान के पत्ते
  • नारियल
  • सुपारी
  • गणगौर के कपडे
  • गेहू
  • बॉस की टोकनी
  • चुनरी का कपड़ा

उद्यापन की सामग्री:

उपरोक्त सभी सामग्री, उद्यापन मे भी लगती है परन्तु, उसके अलावा भी कुछ सामग्री है जोकि, आखरी दिन उद्यापन मे आवश्यक होती है

  • सीरा (हलवा)
  • पूड़ी
  • गेहू
  • आटे के गुने (फल)
  • साड़ी
  • सुहाग या सोलह श्रंगार का समान आदि

गणगौर पूजन की विधि:

मारवाड़ी स्त्रियाँ 16 दिन की गणगौर पूजती है। जिसमे मुख्य रूप से, विवाहित कन्या शादी के बाद की पहली होली पर, अपने माता-पिता के घर या सुसराल मे, 16 दिन की गणगौर बिठाती है। यह गणगौर अकेली नही, जोड़े के साथ पूजी जाती है। अपने साथ अन्य 16 कुवारी कन्याओ को भी, पूजन के लिये पूजा की सुपारी देकर निमंत्रण देती है। 16 दिन गणगौर धूम-धाम से मनाती है अंत मे, उद्यापन कर गणगौर को विसर्जित कर देती है। फाल्गुन माह की पूर्णिमा, जिस दिन होलिका का दहन होता है उसके दूसरे दिन, पड़वा अर्थात् जिस दिन होली खेली जाती है उस दिन से, गणगौर की पूजा प्रारंभ होती है। ऐसी स्त्री जिसके विवाह के बाद कि, प्रथम होली है उनके घर गणगौर का पाटा/चौकी लगा कर, पूरे सोलह दिन उन्ही के घर गणगौर का पूजन किया जाता है।

गणगौर उद्यापन की विधि:

गणगौर पूजा के 16 दिन बाद (अंतिम दिन) जो विवाहिता की गणगौर पूजी जाती है, उसका उद्यापन किया जाता है।

विधि:

  • आखरी दिन गुने(फल) सीरा , पूड़ी, गेहू गणगौर को चढ़ाये जाते है।
  • आठ गुने चढा कर चार वापस लिये जाते है।
  • गणगौर वाले दिन कवारी लड़किया और ब्यावली लड़किया दो बार गणगौर का पूजन करती है एक तो प्रतिदिन वाली और दूसरी बार मे अपने-अपने घर की परम्परा के अनुसार चढ़ावा चढ़ा कर पुनः पूजन किया जाता है उस दिन ऐसे दो बार पूजन होता है।
  • दूसरी बार के पूजन से पहले ब्यावाली स्त्रिया चोलिया रखती है ,जिसमे पपड़ी या गुने(फल) रखे जाते है। उसमे सोलह फल खुद के,सोलह फल भाई के,सोलह जवाई की और सोलह फल सास के रहते है।
  • चोले के उपर साड़ी व सुहाग का समान रखे। पूजा करने के बाद चोले पर हाथ फिराते है।
  • शाम मे सूरज ढलने से पूर्व गाजे-बाजे से गणगौर को विसर्जित करने जाते है और जितना चढ़ावा आता है उसे कथानुसार माली को दे दिया जाता है.
  • गणगौर विसर्जित करने के बाद घर आकर पांच बधावे के गीत गाते है।

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