होली त्यौहार का अर्थ, इतिहास एवं महत्व

होली के बारे में सामान्य ज्ञान: (Holi Festival Information in Hindi)

होली कब मनाई जाती है?

होली रंगों का त्योहार है, जिसे हर साल फागुन के महीने में (मार्च) हिन्दू धर्म के लोग बड़ी धूमधाम से मनाते है। होली बसंत ऋतु में मनाया जाने वाला भारतीय लोगों का प्रमुख त्यौहार है। यह उमंग, उत्साह और अध्यात्म के मेल का त्योहार है। होली का त्यौहार पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है। यह त्यौहार मुख्य रूप से भारत तथा नेपाल में मनाया जाता है। यह पर्व विश्व के कई अन्य देशों जिनमें अल्पसंख्यक हिन्दू लोग रहते हैं, वहाँ भी बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है।

वर्ष 2018 में होली कब मनाई जाएगी:

साल 2018 में होली का त्यौहार 01 मार्च दिन गुरुवार (वीरवार) से शुरू होकर 02 मार्च दिन (शुक्रवार) को मनाया जाएगा।

  • 1 मार्च: होलिका दहन
  • 2 मार्च: रंगवाली होली

होली मनाने की विधि या होली कैसे मनाई जाती है?

होली का ये उत्सव फागुन के अंतिम दिन होलिका दहन की शाम से शुरु होता है और अगला दिन रंगों में सराबोर होने के लिये होता है। छोटे बच्चे होली के त्यौहार का बड़े उत्सुकता से इंतजार करते है तथा आने से पहले ही रंग, पिचकारी, और गुब्बारे आदि की तैयारी में लग जाते है साथ ही सड़क के चौराहे पर लकड़ी, घास और गोबर के ढ़ेर को जलाकर होलिका दहन की प्रथा को निभाते है।

लोग के दिन लोग सामाजिक विभेद को भुलाकर एक-दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं, लोग ढोल बजा कर होली के गीतों पर नाचते-गाते हैं और घर-घर जा कर स्वादिष्ट पकवानों और मिठाईयाँ बाँटकर खुशी का इजहार करते है। ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं और फिर से दोस्त बन जाते हैं। एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है। इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और मिठाइयाँ खिलाते हैं।

होली का इतिहास:

होली भारत के सबसे पुराने त्योहारों में से एक है। होली को होलिका या होलाका नाम से भी मनाया जाता था। होली का का त्यौहार बसंत ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, इस कारण इसे बसंतोत्सव और काम-महोत्सव भी कहा जाता है। इतिहासकारों का मानना है कि आर्यों में भी होली का प्रचलन था लेकिन अधिकतर यह पूर्वी भारत में ही मनाया जाता था। इस पर्व का उल्लेख नारद पुराण औऱ भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी मिलता है।

होली क्यों मनाई जाती है?

प्रचलित मान्यता के अनुसार यह त्योहार प्राचीन समय के एक राजा हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के मारे जाने की याद में मनाया जाता है। काफी समय पहले की बात है। उस एक राजा हुआ करते थे, जिनका नाम हिरण्यकश्यप था। उसकी एक बहन थी जिसका नाम होलिका था और होलिका का प्रह्लाद नामक एक पुत्र था। प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त था और रोजाना उनकी पूजा किया करता था, जबकि उसके पिता चाहते थे कि प्रह्लाद समेत सभी उसकी पूजा करें। लेकिन भक्त प्रह्लाद को ये गवाँरा नहीं था और वह सदा भगवान विष्णु की ही पूजा करता था। इससे क्रोधित होकर उसके पिता ने उसको आग से जलाकर मारने की योजना बनाई। पुराणों में वर्णित है कि हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को भगवान से ये वरदान प्राप्त था कि आग उसे जला नहीं सकती थी। तब हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका से कहा कि वो प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे, ऐसा करने से प्रह्लाद अग्नि में जल जाएगा तथा होलिका बच जाएगी।  होलिका अपने भाई की बात मानकर आग में बैठी गई परंतु प्रह्लाद को इस आग से कोई नुकसान नहीं हुआ बल्कि होलिका ही इस आग में जलकर खाक हो गई। होलिका को यह स्मरण ही नहीं रहा कि अग्नि स्नान वह अकेले ही कर सकती है। तभी से इस त्योहार को मनाने की परम्परा की शुरूआत हुई।

शिव पुराण के अनुसार, हिमालय की पुत्री पार्वती शिव से विवाह हेतु कठोर तप कर रही थीं और शिव भी तपस्या में लीन थे। इंद्र का भी शिव-पार्वती विवाह में स्वार्थ छिपा था कि ताड़कासुर का वध शिव-पार्वती के पुत्र द्वारा होना था। इसी वजह से इंद्र ने कामदेव को शिव जी की तपस्या भंग करने भेजा परन्तु शिव ने क्रोधित हो कामदेव को भस्म कर दिया। शिव जी की तपस्या भंग होने के बाद देवताओं ने शिव को पार्वती से विवाह के लिए राजी कर लिया। इस कथा के आधार पर होली में काम की भावना को प्रतीकात्मक रूप से जला कर सच्चे प्रेम की विजय का उत्सव मनाया जाता है।

ब्रज की होली:

उत्तर प्रदेश के वृन्दावन में खेली जाने वाली ब्रज की लट्ठमार होली तो पूरी दुनिया में मशहूर है। विश्व को प्यार का संदेश देने वाली नगरी में प्यार जताने का यह अंदाज, लाठियों की खटखट के बावजूद कम लुभावना नहीं है। दरअसल, यह मार नहीं, प्यार है। यही मार और प्यार होली पर दुनिया भर के सैलानियों को मथुरा-वंदावन खींच लाता है। इसमें शामिल होने देश के अलग-अलग हिस्सों से मस्तों की टोली पहुंचती है।

पूरे ब्रज इलाके में होली पांच दिन की होती है। जब पूरे देश से रंग का खुमार उतरना शुरू होता है, तब भी यहां उमंग चरम पर होता है। तैयारी तो महीने भर से शुरू हो जाती है। इसकी आहट गली-गली में सुनाई देती है। इस्कॉन टेंपल से लेकर बांके बिहारी मंदिर तक आयोजन भव्य पैमाने पर होता है। होली के पांचों दिन बांके बिहारी मंदिर के आगे रंग में सराबोर हजारों का हुजूम जमा होता है।

होली के त्यौहार के महत्व:

होली का त्यौहार अपनी सांस्कृतिक और पारंपरिक मान्यताओं की वजह से बहुत प्राचीन समय से मनाया जा रहा है। इसका उल्लेख भारत की पवित्र पुस्तकों, जैसे पुराण, दसकुमार चरित, संस्कृत नाटक, रत्नावली और भी बहुत सारी पुस्तकों में किया गया है।

होली का सामाजिक महत्व:

होली के त्यौहार का अपने आप में सामाजिक महत्व है, होली के दिन सभी लोग पुराने भेदभाव भुलाकर एक-दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं। सभी लोग एक-दूसरे के घर जा कर स्वादिष्ट पकवानों और मिठाईयाँ बाँटकर खुशी का इजहार करते है। यह पर्व सभी समस्याओं को दूर करके लोगों को बहुत करीब लाता है, उनके बंधन को मजबूती प्रदान करता है।

होली का वैज्ञानिक महत्व:

होली सिर्फ एक त्योहार ही नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण से लेकर आपकी सेहत के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। होली का पर्व साल में ऐसे समय पर आता है, जब मौसम में बदलाव के कारण लोग आलसी से होते हैं। ठंडे मौसम के गर्म रुख अख्तियार करने के कारण शरीर का थकान और सुस्ती महसूस करना प्राकृतिक है। होली वाले दिन सभी जोर से गाते नाचते हैं, जिससे मानवीय शरीर को नई ऊर्जा प्रदान होती है। यह त्योहार हमारे शरीर और मन पर बहुत लाभकारी प्रभाव डालता है। होली के त्यौहार पर होलिका दहन की परंपरा है। वैज्ञानिक रूप से यह वातावरण को सुरक्षित और स्वच्छ बनाती है क्योंकि सर्दियॉ और बसंत का मौसम बैक्टीरियाओं के विकास के लिए आवश्यक वातावरण प्रदान करता है। सम्पूर्ण भारत में समाज के विभिन्न-2 स्थानों पर होलिका दहन के कारण वातावरण का तापमान 145 डिग्री फारेनहाइट तक बढ़ जाता है, जो बैक्टीरिया और अन्य हानिकारक कीटों को मारता है।

होली उत्सव का बदलता रूप:

समय के बदलते परिवेश से देश में होली का स्वरूप भी बदलता जा रहा है। सामुदायिक त्योहार की पहचान रखने वाला यह पर्व अब धीरे-धीरे जाति और समूह के दायरे में बंट रहा है। इसकी प्राचीन परंपराएं भी तेजी से खत्म होने लगी हैं। पहले हिंदी भाषी प्रदेशों में फागुन का महीना चढ़ते ही फिजा में होली के रंगीले और सुरीले गीत तैरने लगते थे। इनको स्थानीय भाषा में फाग या फगुआ गीत कहा जाता है, लेकिन वक़्त की कमी, बदलती जीवनशैली और कई अन्य वजहों से शहरों और गावों दोनों ही जगह यह परंपराएं लुप्त होती जा रही है। अब लोगों में प्रेम की भावना ही गायब होती जा रही है। ज्यादातर लोग लोग टीवी से चिपके रहते हैं और आपसी भेदभाव की वजह से एक-दूसरे से मिलने तक भी नहीं जाते है। गांवों के चौपालों से होली खेलने के लिए निकलने वाली टोली में बुजुर्ग से लेकर युवा शामिल होते थे। यह टोली सामाजिक एकता की मिसला होती थी, परन्तु इन्टरनेट के चलन के बाद देश के युवा होली के त्यौहार को ज्यादा महत्व ना देकर दिनभर अपने मोबाइल और लैपटॉप में ही व्यस्त रहते है। इस प्रकार हम कह सकते है, कि समय के बदलते सवरूप से होली के रंग अब फीके पड़ते जा रहे है।

This post was last modified on December 4, 2018 4:29 pm

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