खगोल विज्ञान क्या है ?

✅ Published on September 10th, 2020 in भारतीय रेलवे, विज्ञान, सामान्य ज्ञान अध्ययन

खगोल विज्ञान क्या है ? – What is Astronomy ?

खगोलिकी ब्रह्मांड में अवस्थित आकाशीय पिंडों का प्रकाश, उद्भव, संरचना और उनके व्यवहार का अध्ययन खगोलिकी का विषय है। अब तक ब्रह्मांड के जितने भाग का पता चला है उसमें लगभग 19 अरब आकाश गंगाओं के होने का अनुमान है और प्रत्येक आकाश गंगा में लगभग 10 अरब तारे हैं। आकाश गंगा का व्यास लगभग एक लाख प्रकाशवर्ष है। हमारी पृथ्वी पर आदिम जीव 2 अरब साल पहले पैदा हुआ और आदमी का धरती पर अवतण 10-20 लाख साल पहले हुआ।

वैज्ञानिकों के अनुसार इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक महापिंड के विस्फोट से हुई है। सूर्य एक औसत तारा है जिसके आठ मुख्य ग्रह हैं, उनमें से पृथ्वी भी एक है। इस ब्रह्मांड में हर एक तारा सूर्य सदृश है। बहुत-से तारे तो ऐसे हैं जिनके सामने अपना सूर्य अणु (कण) के बराबर भी नहीं ठहरता है। जैसे सूर्य के ग्रह हैं और उन सबको मिलाकर हम सौर परिवार के नाम से पुकारते हैं, उसी प्रकार हरेक तारे का अपना अपना परिवार है। बहुत से लोग समझते हैं कि सूर्य स्थिर है, लेकिन संपूर्ण सौर परिवार भी स्थानीय नक्षत्र प्रणाली के अंतर्गत प्रति सेकेंड 13 मील की गति से घूम रहा है। स्थानीय नक्षत्र प्रणाली आकाश गंगा के अंतर्गत प्रति सेकेंड 200 मील की गति से चल रही है और संपूर्ण आकाश गंगा दूरस्थ बाह्य ज्योर्तिमालाओं के अंतर्गत प्रति सेकेंड 100 मील की गति से विभिन्न दिशाओं में घूम रही है।

अंतरिक्ष क्या है ?- What is space ?

आसान भाषा में कहा जाए तो अंतरिक्ष एक वायु रहित खाली विस्तृत क्षेत्र है, जिसकी सीमाएं सभी दिशाओं में अनन्त तक फैली हुई है। सौर मंडल, असंख्या तारे, तारकीय धूल और मंदाकिनियां सभी अंतरिक्ष के अवयव हैं। इसमें किसी प्रकार की हवा नहीं है, और न ही बादल है। दिन हो या रात, अंतरिक्ष सदा काला ही रहता है। अंतरिक्ष में कोई प्राणी नहीं रहता। निर्वात होने के कारण वहां कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह सकता है।

अंतरिक्ष कहां से शुरू होता है, इस तथ्य की कोई जानकारी नहीं है। अंतरिक्ष हमें चारों ओर से घेरे हुए है। समझाने के लिए हम इतना ही कह सकते हैं कि अंतरिक्ष वहां से शुरू होता है जहां पृथ्वी का वायुमंडल समाप्त होता है।

ब्रह्माण्ड क्या है ? – What is universe ?

ब्रह्माण्ड सम्पूर्ण समय और अंतरिक्ष और उसकी अंतर्वस्तु को कहते हैं। ब्रह्माण्ड में सभी ग्रह, तारे, गैलेक्सियाँ, खगोलीय पिण्ड, गैलेक्सियों के बीच के अंतरिक्ष की अंतर्वस्तु, अपरमाणविक कण, और सारा पदार्थ और सारी ऊर्जा शामिल है। अवलोकन योग्य ब्रह्माण्ड का व्यास वर्तमान में लगभग 28 अरब पारसैक (91.1 अरब प्रकाश-वर्ष) है। पूरे ब्रह्माण्ड का व्यास अज्ञात है, और हो सकता है कि यह अनन्त हो।

  • ब्रह्माण्ड के अंतर्गत उन सभी आकाशीय पिण्डों एवं उल्काओं तथा समस्त और परिवार, जिसमें सूर्य, चन्द्र पृथ्वी आदि भी शामिल हैं, का अध्ययन किया जाता है।
  • ब्रह्माण्ड को नियमित अध्ययन का प्रारम्भ क्लाडियस टालेमी द्वारा (140 ई. में) हुआ।
  • टालेमी के अनुसार पृथ्वी, ब्रह्मण्ड के केन्द्र में है तथा सूर्य और अन्य गृह इसकी परिक्रमा करते हैं।
  • 1573 ई. में कॉपरनिकस ने पृथ्वी के बदले सूर्य को केन्द्र में स्वीकार किया।
  • पृथ्वी व चन्द्रमा के बीच का अन्तरिक्ष भाग सिसलूनर कहलाता है।

ब्रह्मांड की उत्पत्ति की वैज्ञानिक परिकल्पना:

  • बिग बैंग सिद्वान्त– जार्ज लेमेण्टर
  • निरंतर उत्पत्ति का सिद्धान्त– थामॅस गोल्ड और हमैन बॉण्डी
  • संकुचन विमोचन का सिद्धान्त– डा. एलेन सैण्डिज
  • ब्रह्माण्ड की जानकारी की सबसे आधुनिक स्रोत प्रो. ज्योकरांय बुरबिज द्वारा, जिन्होंने प्रतिपादित किया कि प्रत्येक गैलेक्सी ताप नाभिकीय अभिक्रिया के फलस्वरूप काफी मात्रा में हिलियम उत्सर्जित करते हैं।
  • प्रकाश वर्ष वह दूरी है, जिसे प्रकाश शून्य में 29,7925 किमी. प्रति से. या लगभग 186282 मील प्रति से. की गति से तय करता है।
  • ब्रह्माण्ड ईकाई से तात्पर्य सूर्य और पृथ्वी के बीच की औसत दूरी जो 149597870 किमी. (लगभग 149600,000 किमी.) या 15 किमी. है।
  • सूर्य और उसके पड़ोसी तारे सामान्य तौर से एक गोलाकार कक्षा में 150 किमी. प्रति सें. की औसत गति से मंदाकिनी के केन्द्र के चारों ओर परिक्रमा करते हैं। इस गति से केन्द्र के चारों ओर एक चक्कर पूरा करने में सूर्य को 25 करोड; वर्ष लगते हैं। यह अवधि ब्रह्माण्ड वर्ष कहलाती है।

आकाशगंगा क्या है ? – What is the Milky Way ?

आकाश गंगा या क्षीरमार्ग उस आकाशगंगा (गैलेक्सी) का नाम है, जिसमें हमारा सौर मण्डल स्थित है। आकाशगंगा आकृति में एक सर्पिल (स्पाइरल) गैलेक्सी है, जिसका एक बड़ा केंद्र है और उस से निकलती हुई कई वक्र भुजाएँ। हमारा सौर मण्डल इसकी शिकारी-हन्स भुजा (ओरायन-सिग्नस भुजा) पर स्थित है। क्षीरमार्ग में 100 अरब से 400 अरब के बीच तारे हैं और अनुमान लगाया जाता है कि लगभग 50 अरब ग्रह के होने की संभावना है, जिनमें से ५० करोड़ अपने तारों से ‘जीवन-योग्य तापमान’ की दूरी पर हैं। सन् 2011 में होने वाले एक सर्वेक्षण में यह संभावना पायी गई कि इस अनुमान से अधिक ग्रह हों – इस अध्ययन के अनुसार, क्षीरमार्ग में तारों की संख्या से दुगने ग्रह हो सकते हैं। हमारा सौर मण्डल आकाशगंगा के बाहरी इलाक़े में स्थित है और उसके केंद्र की परिक्रमा कर रहा है। इसे एक पूरी परिक्रमा करने में लगभग 22.5 से 25 करोड़ वर्ष लग जाते हैं।

तारे क्या हैं ? what is Stars ?

तारे (Stars) स्वयंप्रकाशित (self-luminous) उष्ण वाति की द्रव्यमात्रा से भरपूर विशाल, खगोलीय पिंड हैं। इनका निजी गुरुत्वाकर्षण (gravitation) इनके द्रव्य को संघटित रखता है। मेघरहित आकाश में रात्रि के समय प्रकाश के बिंदुओं की तरह बिखरे हुए, टिमटिमाते प्रकाशवाले बहुत से तारे दिखलाई देते हैं। सूर्य बड़ा तारा है।

तारों से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य:

  • तारों का निर्माण आकाश गंगा में गैस के बादलों से होता है। तारों से निरन्तर ऊर्जा का उत्सर्जन होता है।
  • गैलेक्सी का 98 प्रतिशत भाग तारों से निर्मित है। ये गैसीय द्रव्य के उष्णा एवं दीप्तिमान ब्रह्माण्ड में स्थित खलोलीय पिण्ड हैं।
  • सूर्य भी तारा है जो पृथ्वी के सबसे निकटतम है।
  • साइरस पृथ्वी से देखा जाने वाला सर्वाधिक चमकीला तारा है।
  • वामन तारा वे तारे हैं, जिनकी ज्योत्सना सूर्य से कम है।
  • विशाल तारों की ज्योत्सना सूर्य से अधिक है जैसे-बेटेलगीज, सिरियस, अंतारिस।
  • नोवा वह तारा जिनकी चमक गैसों के निष्कासित होने से 10 से 20 तक बढ़ जाती है।
  • यदि तारे का भार सूर्य के लगभग बराबर होता है तो यह धीरे-धीरे ठण्डा होकर पहले गोले में बदलता है फिर और ठण्डा होकर अंत में एक श्वेत छोटे पिण्ड में परिवर्तित हो। जाता है। कुछ समय पश्चात् यह छोटा पिण्ड अपने ऊपर गिरने वाले प्रकाश को अवशोषित करने लगता है। तब यह आंखों से न दिखने वाले ब्लैक होल में बदल जाता है।
  • तारों या गैलेक्सी की गति से उसके प्रकाश में परिवर्तन दिखाई देता है। यदि तारा प्रेक्षक की तरफ रहा है तो उसका प्रकाश स्पेक्ट्रम के नीले किनारे की ओर चलेगा। किंतु यदि तारा प्रेक्षक से दूर जा रहा है तो उसका प्रकाश स्पेक्ट्रम के बाल किनारे की तरफ खिसक जायेगा। इसे डाप्लर प्रभाव कहते हैं।
  • सुपरनोवा तारा 20 से अधिक चमकने वाला तारा है। पृथ्वी से देखा जाने वाला सबसे अधिक चमकीला तारा क्रेस डांग तारा है।
  • ब्लैक होल बनने का कारण है- तारों की ऊर्जा समाप्त हो जाना। प्रत्येक तारा लगातार ऊर्जा की बड़ी मात्रा में उत्सर्जन करता रहता है और निरंतर सुकड़ता जाता है जिसके कारण गुरुत्वाकर्षण बढ़ता जाता है। इस ऊर्जा उत्सर्जन के कारण अंत एक समय आता है, जब ऊर्जा समाप्त हो जाती है और तारों का बहना रुक जाता है।
  • तारे सफेद दिखाई देते हैं, लेकिन सभी तारे सफेद नहीं होते, कुछ नारंगी, लाल या नीले रंग के भी होते हैं। अत्यधिक तप्त तारों का रंग नीला होता है और ठंडे तारों का लाल। सूर्य पीला तारा है। नीले तारों का तापमान 27,750°C तथा सूर्य का 6000°C से होता है। इसलिए कोई भी अंतरिक्ष यात्री कभी भी किसी भी तारे पर नहीं उतर सकता।
  • अंतरिक्ष यान को चंद्रमा तक पहुंचने में तीन दिन का समय लगता है। सूर्य तक जाने में कई महीने चाहिए। अंतरिक्ष यान को सबसे नजदीकी तारे तक पहुंचने में हजारों वर्ष लग सकते है। इतनी लंबी दूरी को कि.मी. में मापना एक कठिन समस्या है। इसलिए वैज्ञानिक तारों की दूरी मापने के लिए प्रकाश वर्ष और पारसेक इकाइयों का इस्तेमाल करते हैं। प्रकाश वर्ष वह दूरी है, जिसे प्रकाश तीन लाख कि.मी. प्रति सेकण्ड की रफ्तार से चलकर एक वर्ष में तय करता है- यानी 30.857×1012 किमी.।
  • खगोलशास्त्र में तारामंडल आकाश में दिखने वाले तारों के किसी समूह को कहते हैं। इतिहास में विभिन्न सभ्यताओं नें आकाश में तारों के बीच में कल्पित रेखाएँ खींचकर कुछ आकृतियाँ प्रतीत की हैं जिन्हें उन्होंने नाम दे दिए। मसलन प्राचीन भारत में एक मृगशीर्ष नाम का तारामंडल बताया गया है, जिसे यूनानी सभ्यता में ओरायन कहते हैं, जिसका अर्थ “शिकारी” है। प्राचीन भारत में तारामंडलों को नक्षत्र कहा जाता था। आधुनिक काल के खगोलशास्त्र में तारामंडल उन्ही तारों के समूहों को कहा जाता है जिन समूहों पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ में सहमति हो!

क्वेसार और ब्लैक होल:

क्वेसार:  क्वेसार (quasar), जो “क्वासी स्टेलर रेडियो स्रोत” (quasi-stellar radio source) का संक्षिप्त रूप है, किसी अत्यंत तेजस्वी सक्रीय गैलेक्सीय नाभिक को कहते हैं। अधिकांश बड़ी गैलेक्सियों के केन्द्र में एक विशालकाय कालाछिद्र होता है, जिसका द्रव्यमान लाखों या करोड़ों सौर द्रव्यमानों के बराबर होता है। क्वेसार और अन्य सक्रीय गैलेक्सीय नाभिकों में इस कालेछिद्र के इर्द-गिर्द एक गैसीय अभिवृद्धि चक्र होता है। जब इस अभिवृद्धि चक्र की गैस कालेछिद्र में गिरती है तो उस से विद्युतचुंबकीय विकिरण के रूप में ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो विद्युतचुंबकीय वर्णक्रम में रेडियो, अवरक्त, प्रकाश, पराबैंगनी, ऍक्स-किरण और गामा किरण के तरंगदैर्घ्य में होती है। क्वेसारों से उत्पन्न ऊर्जा भयंकर होती है और सबसे शक्तिशाली क्वेसार की तेजस्विता 1041 वॉट से अधिक होती है, जो हमारे क्षीरमार्ग जैसी बड़ी गैलेक्सियों से हज़ारों गुना अधिक है।

ब्लैक होल: कृष्ण विवर (Black Hole) या ब्लैक होल इतने शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र वाली कोई ऐसी खगोलीय वस्तु है, जिसके खिंचाव से प्रकाश-सहित कुछ भी नहीं बच सकता। कालेछिद्र के चारों ओर घटना क्षितिज नामक एक सीमा होती है जिसमें वस्तुएँ गिर तो सकती हैं परन्तु बाहर नहीं आ सकती। इसे “काला” (कृष्ण) इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह अपने ऊपर पड़ने वाले सारे प्रकाश को भी अवशोषित कर लेता है और कुछ भी परावर्तित नहीं करता। यह ऊष्मागतिकी में ठीक एक आदर्श कृष्णिका की तरह है। कालेछिद्र का क्वांटम विश्लेषण यह दर्शाता है कि उनमें तापमान और हॉकिंग विकिरण होता है।

सूर्य क्या है ? what is Sun ?

सूर्य अथवा सूरज सौरमंडल के केन्द्र में स्थित एक तारा जिसके चारों तरफ पृथ्वी और सौरमंडल के अन्य अवयव घूमते हैं। सूर्य हमारे सौर मंडल का सबसे बड़ा पिंड है और उसका व्यास लगभग 13 लाख 10 हज़ार किलोमीटर है जो पृथ्वी से लगभग 109 गुना अधिक है। ऊर्जा का यह शक्तिशाली भंडार मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम गैसों का एक विशाल गोला है। परमाणु विलय की प्रक्रिया द्वारा सूर्य अपने केंद्र में ऊर्जा पैदा करता है। सूर्य से निकली ऊर्जा का छोटा सा भाग ही पृथ्वी पर पहुँचता है जिसमें से 15 प्रतिशत अंतरिक्ष में परावर्तित हो जाता है, 30 प्रतिशत पानी को भाप बनाने में काम आता है और बहुत सी ऊर्जा पेड़-पौधे समुद्र सोख लेते हैं। इसकी मजबूत गुरुत्वाकर्षण शक्ति विभिन्न कक्षाओं में घूमते हुए पृथ्वी और अन्य ग्रहों को इसकी तरफ खींच कर रखती है।y

सूर्य से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्य:

  • पृथ्वी से सूर्य की दूरी लगभग 15 करोड़ किमी. है। इसका व्यास लगभग 1,400,000 किमी. है, यानी पृथ्वी के व्यास का 109 गुना। इसका गुरूत्वाकर्षण पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण की तुलना में 28 गुना अधिक है।
  • आकाशगंगा के केन्द्र से सूर्य की दूरी आधुनिक अनुमान के आधार पर 32,000 प्रकाश वर्ष है। 250 किमी. प्रति सेकंड की औसत गति से केंद्र के चारों ओर एक चक्कर पूरा करने में सूर्य को 22.5 करोड़ वर्ष लगते हैं। यह अवधि ब्रह्मांड वर्ष कहलाती है। सूर्य पृथ्वी की तरह अपने अक्ष पर भी घूमता है। सूर्य गैसों का बना है इसलिए विभिन्न अक्षांशों पर विभिन्न गति से घूम सकता है। ध्रुवों पर उसके घूमने की अवधि लगभग 24-26 दिन है और भूमध्य रेखा पर 34-37 दिन है। यह पृथ्वी से 300,000 गुना अधिक भारी है।
  • सूर्य चमकती हुई गैसों का एक महापिंड है। इसको एक विशाल हाइड्रोजन बम कह सकते हैं, क्योंकि इसमें नाभिकीय संलयन द्वारा अत्यधिक ऊष्मा और प्रकाश पैदा होते हैं। इससे आने वाले प्रकाश और गर्मी से ही पृथ्वी पर जीवन संभव है। इसके प्रकाश को धरती तक पहुंचने में 8 मिनट 20 सेकंड का समय लगता है।
  • सूर्य की दिखाई देने वाली बाहरी सतह को फोटोस्फियर कहते हैं, जिसका तापमान लगभग 6000°C सेल्सियस है, लेकिन केन्द्र का तापमान 15,000,000°C सेल्सियस है।
  • सूर्य की सतह या फोटोस्फियर से चमकती हुई लपटें उठती रहती हैं, जिन्हें सौर ज्वालाएं कहते हैं। ये लगभग 1000,000 किमी. ऊँचाई तक पहुंचती हैं।

सूर्य की संरचना

  • प्रकाश मण्डल सूर्य की दिखाई देने वाली दिप्तिमान सतह है।
  • प्रकाश मण्डल के किनारे वाला थाम जो दिप्तिमान नहीं होता है इसका रंग लाल होता है, वर्णमण्डल कहलाता है।
  • प्रभामण्डल सूर्य का बाह्तम भाग (जो केवल ग्रहण के समय दिखता है)।
  • Corona से x-किरणे उत्सर्जित करती हैं और पूर्ण सूर्य ग्रहण के समय पृथ्वी इसी कोरोना से प्रकाशित होता है।
  • जब सूर्य के किसी भाग का ताप अन्य भागों की तुलना में कम हो जाता है तो धब्बे के रूप में दिखता है, जिसे सौर कलंक कहते हैं। इस धब्बे का जीवनकाल कुछ घण्टों से लेकर कुछ सप्ताह तक होता है। कई दिनों तक सौर कलंक बने रहने के पश्चात् रेडियो संचार में बाधा आती है।

सूर्य की सतह पर काले धब्बे भी दिखाई देते हैं। ये सूर्य की सतह के तापमान (6000°C सेल्सियस) से अपेक्षाकृत लगभग 1500°C सेल्सियस ठंडे होते हैं। इन धब्बों का जीवन काल कुछ घंटों से लेकर कई सप्ताह तक होता है। एक बड़े धब्बे का तापमान 4000-5000° सेल्सियस तक हो सकता है। धब्बे तो हमारी पृथ्वी से भी कई गुना बड़े होते हैं।

सौर मंडल क्या है ? What is Solar System ?

सौर मंडल में सूर्य और वह खगोलीय पिंड सम्मलित हैं, जो इस मंडल में एक दूसरे से गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा बंधे हैं। किसी तारे के इर्द गिर्द परिक्रमा करते हुई उन खगोलीय वस्तुओं के समूह को ग्रहीय मण्डल कहा जाता है जो अन्य तारे न हों, जैसे की ग्रह, बौने ग्रह, प्राकृतिक उपग्रह, क्षुद्रग्रह, उल्का, धूमकेतु और खगोलीय धूल। हमारे सूरज और उसके ग्रहीय मण्डल को मिलाकर हमारा सौर मण्डल बनता है। इन पिंडों में आठ ग्रह, उनके 172 ज्ञात उपग्रह, पाँच बौने ग्रह और अरबों छोटे पिंड शामिल हैं। इन छोटे पिंडों में क्षुद्रग्रह, बर्फ़ीला काइपर घेरा के पिंड, धूमकेतु, उल्कायें और ग्रहों के बीच की धूल शामिल हैं।

सौरमंडल के चार छोटे आंतरिक ग्रह बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल ग्रह जिन्हें स्थलीय ग्रह कहा जाता है, जो मुख्यतया पत्थर और धातु से बने हैं। और इसमें क्षुद्रग्रह घेरा, चार विशाल गैस से बने बाहरी गैस दानव ग्रह, काइपर घेरा और बिखरा चक्र शामिल हैं। काल्पनिक और्ट बादल भी सनदी क्षेत्रों से लगभग एक हजार गुना दूरी से परे मौजूद हो सकता है।

सूर्य से होने वाला प्लाज़्मा का प्रवाह (सौर हवा) सौर मंडल को भेदता है। यह तारे के बीच के माध्यम में एक बुलबुला बनाता है जिसे हेलिओमंडल कहते हैं, जो इससे बाहर फैल कर बिखरी हुई तश्तरी के बीच तक जाता है।

भारत का खगोल विज्ञान के क्षेत्र में योगदान:

प्राचीन भारत में कई महान खगोल शास्त्री हुए हैं जिन्होंने कई खगोल विज्ञान के सिद्धांतों और यंत्रों का आविष्कार किया, इससे खगोल विज्ञान का काफी विकास हुआ, मध्यकाल में राजाओं ने अंतरिक्ष वेधशाला का निर्माण किया तथा खगोल शास्त्रियों की बहुत आर्थिक मदद की।

भारत के कुछ प्राचीन खगोल वैज्ञानिक और उनके योगदान का वर्णन हम संक्षिप्त रूप से यहां कर रहे हैं.

लागध (Lagadha) :- ईसा से हजार वर्ष पूर्व लागध ने वेदांग ज्योदिश नाम के ग्रन्थ की रचना की, इस ग्रन्थ में आकाशीय घटनाओं के समय का वर्णन किया गया हे जिनका उपयोग सामाजिक और धार्मिक कार्यों के समय का निर्धारण करने में किया जाता था। इस ग्रन्थ में समय, मौसम चन्द्र महीनों सूर्य महीनो आदि का वर्णन है। इस ग्रन्थ में 27 नक्षत्र समूहों, ग्रहणों, साथ ग्रहों, और ज्योतिष की 12 राशियों का ज़िक्र हे।

आर्यभट :- आर्यभट का समय कल 476 – 550 ईसा पूर्व है, आर्यभट ने खगोल शाश्त्र के दो ग्रंथो की रचना की, आर्यभट्टिया और आर्यभट्ट सिद्धांत, इन ग्रंथों में आर्यभट ने पहली बार बताया की प्रथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है, तथा यही कारण हे की सभी तारे पश्चिम की और जाते हुए दिखाई देतें है, आर्यभट ने लिखा की पृथ्वी एक गोला हे जिसका व्यास 39967 Km. है, आर्यभट ने ही चंद्रमा के चमकने का कारण बताया और कहा के या सूर्य के प्रकाश की वजह से चमकता है।

ब्रह्मगुप्त :- ब्रह्मगुप्त का समयकाल 598-668 ईसा पूर्व है, इन्होने ब्रह्मगुप्त सिद्धांत नमक ग्रन्थ की रचना की, इस ग्रन्थ का बगदाद में अरबी भाषा में अनुवाद किया गया और इसने इस्लामिक गणित और खगोल विज्ञान पर बहुत प्रभाव डाला, इस ग्रन्थ में दिन के समय की शुरुआत रात्रि 12 बजे बताई गयी, ब्रह्मगुप्त ने यह सिद्धांत लिखा की सभी द्रव्यमान वाली चीजें पृथ्वी की और आकर्षित होती है,

वरहामिहिर: वरहामिहिर का समय कल 505 ईसा पूर्व माना जाता हे, वरहामिहिर ने भारतीय,ग्रीक,मिश्र और रोमन खगोल शास्त्र का अध्यन किया, उन्हें इस समस्त ज्ञान को अपने ग्रन्थ पंकसिद्धान्तिका में एक जगह एकत्रित किया।

भास्कर 1 :- इनका समयकाल 629 ईसा पूर्व इन्होने तीन ग्रंथो महाभास्कर्य, लघु भास्कर्य, और आर्य भट्टिया भाष्य नमक ग्रंथो की रचना की. इन ग्रंथो में खगोल विज्ञान के कई सिद्धांतों का वर्णन है।

भास्कर द्वितीय :-इनका समय काल 1114 इसवी का हे, यह उज्जैन की वेधशाला के प्रमुख थे, इन्होने सिद्धांत शिरोमणि और करानाकुतुहलाह नमक ग्रंथो की रचना की।

इनके आलावा भारत में कई और खगोल शाश्त्री हुए जिन्होंने कई नए ग्रंथो की रचना कर खगोल विज्ञान के विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया, इनमे श्रीपति, महेंद्र सूरी, नीलकंठ सोमाया, अच्युता पिसरति प्रमुख हैं।

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सौरमंडल के ग्रहो से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों की सूची

 


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