भारत में पाई जाने वाली मिट्टियाँ

भारत की प्रमुख मिट्टियाँ और उनके प्रकार | Types of Indian Soils in Hindi
भारत में पाई जाने वाली प्रमुख मिट्टियाँ

भारत की मिट्टियों के प्रकार और उनका विवरण: (Major Soils of India GK in Hindi)

मृदा या मिट्टी किसे कहते है?

मिट्टी का अर्थ या परिभाषा: पृथ्वी ऊपरी सतह पर मोटे, मध्यम और बारीक कार्बनिक तथा अकार्बनिक मिश्रित कणों को मृदा (मिट्टी) कहते हैं। मिट्टी का निर्माण टूटी चट्टानो के छोटे महीन कणों, खनिज, जैविक पदार्थो, बॅक्टीरिया आदि के मिश्रण से होता है| मिट्टी के कई परतें होती हैं, सबसे उपरी परत में छोटे मिट्टी के कण, गले हुए पौधे और जीवों के अवशेष होते हैं यह परत फसलों की पैदावार के लिए महत्त्‍वपूर्ण होती है। दूसरी परत महीन कणों जैसे चिकनी मिट्टी की होती है और नीचे की विखंडित चट्टानो और मिट्टी का मिश्रण होती है तथा आख़िरी परत में अ-विखंडित सख्‍त चट्टानें होती हैं। ‘मृदा विज्ञान’  भौतिक भूगोल की एक प्रमुख शाखा है जिसमें मृदा के निर्माण, उसकी विशेषताओं एवं धरातल पर उसके वितरण का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता हैं।

भारत में मिट्टी के प्रकार (वर्गीकरण) | Types of Indian Soils in Hindi:

मिट्टी या मृदा कई तरह की होती है और हर प्रकार की मिट्टी का इस्तेमाल गुणों के मुताबिक अलग-अलग होता हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् ने भारत की मिट्टी को 8 वर्गों में बांटा है। मृदा संरक्षण के लिए 1953 में केन्द्रीय मृदा संरक्षण बोर्ड की स्थापना की गयी थी। मरूस्थल की समस्या के अध्ययन के लिए राजस्थान को जोधपुर में अनुसंधान केन्द्र बनाये गये हैं। भारत में मिलने वाली मिट्टी की प्रमुख किस्में इस प्रकार हैं:-

  1. जलोढ़ या कांप मिट्टी (Alluvial Soil)
  2. लाल मिट्टी (Red Soil)
  3. काली मिट्टी (Black Soil)
  4. लैटेराइट मिट्टी (Laterite Soil)
  5. क्षारयुक्त मिट्टी (Saline and Alkaline Soil)
  6. हल्की काली एवं दलदली मिट्टी (Peaty and Other Organic soil)
  7. रेतीली मिट्टी (Arid and Desert Soil)
  8. वनों वाली मिट्टी (Forest Soil)

1. जलोढ़ या कांप (Alluvial Soil) मिट्टी किसे कहते है?

जलोढ़ मिट्टी उत्तर भारत के पश्चिम में पंजाब से लेकर सम्पूर्ण उत्तरी विशाल मैदान को आवृत करते हुए गंगा नदी के डेल्टा क्षेत्र तक फैली है। यह अत्यंत ऊपजाऊ है इसे कांप या कछारीय मिट्टी भी कहा जाता है। यह भारत के लगभग 40% भाग में पाई जाती है। इस मिट्टी का विस्तार सामान्यतः देश की नदियों के वेसिनों एवं मैदानी भागों तक ही सीमित है। हल्के भूरे रंगवाली यह मिट्टी 7.68 लाख वर्ग किमी को आवृत किये हुए है और यह सतलज, गंगा, यमुना, घाघरा,गंडक, ब्रह्मपुत्र और इनकी सहायक नदियों द्वारा लाई जाती है|  इस मिट्टी में कंकड़ नही पाए जाते हैं। इस मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस और वनस्पति अंशों की कमी पाई जाती है। खादर में ये तत्व भांभर की तुलना में अधिक मात्रा में वर्तमान हैं, इसलिए खादर अधिक उपजाऊ है। भांभर में कम वर्षा के क्षेत्रों में, कहीं कहीं खारी मिट्टी ऊसर अथवा बंजर होती है। भांभर और तराई क्षेत्रों में पुरातन जलोढ़, डेल्टाई भागों नवीनतम जलोढ़, मध्य घाटी में नवीन जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है। पुरातन जलोढ़ मिट्टी के क्षेत्र को भांभर और नवीन जलोढ़ मिट्टी के क्षेत्र को खादर कहा जाता है।

इसकी भौतिक विशेषताओं का निर्धारण जलवायविक दशाओं विशेषकर वर्षा तथा वनस्पतियों की वृद्धि द्वारा किया जाता है। इस मिट्टी में उत्तरी भारत में सिंचाई के माध्यम से दालें, कपास, गन्ना, गेहूँ, चावल, जूट, तम्बाकू, तिलहन फसलों तथा सब्जियों की खेती की जाती है।

2. लाल मिट्टी (Red Soil) किसे कहते है?

लाल मिट्टी का निर्माण जलवायविक परिवर्तनों के परिणाम स्वरूप रबेदार एवं कायन्तरित शैलों के विघटन एवं वियोजन से होता है। इस मिट्टी में कपास, गेहूँ, दालें तथा मोटे अनाजों की कृषि की जाती है। ग्रेनाइट शैलों से निर्माण के कारण इसका रंग भूरा, चाकलेटी, पीला अथवा काला तक पाया जाता है। इसमें छोटे एवं बड़े दोनों प्रकार के कण पाये जाते हैं। छोटे कणों वाली मिट्टी काफ़ी उपजाऊ होती है, जबकि बड़े कणों वाली मिट्टी प्रायः उर्वरताविहीन बंजरभूमि के रूप में पायी जाती है। इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस तथ जीवांशों की कम मात्रा मिलती है, जबकि लौह तत्व, एल्युमिना तथा चूना पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। इस मिट्टी का संघटन इस प्रकार है-

  • अघुलनशील तत्व- 90.47%
  • लोहा-: 3.61%
  • एल्यूमिनीयम: 2.92%
  • जीवांश: 1.01%
  • मैग्निशिया: 0.70%
  • चूना: 0.56%
  • कार्बन डाई ऑक्साइड: 0.30%
  • पोटाश: 0.24%

3. काली मिट्टी (Black Soil) किसे कहते है?

काली मिट्टी को ‘रेगड़ मिट्टी’ या ‘काली कपास मिट्टी’ के नाम से भी जाना जाता है। काली मिट्टी एक परिपक्व मिट्टी है, जो मुख्यतः दक्षिणी प्राय:द्वीपीय पठार के लावा क्षेत्र में पायी जाती है। इसका निर्माण चट्टानों के दो वर्ग दक्कन ट्रैप एवं लौहमय नीस और शिस्ट से हुआ है। ये मिट्टी भारत के कछारी भागों में मुख्य रूप से पाई जाती है। कपास की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होने के कारण इसे ‘काली कपास मिट्टी’ अथवा ‘कपासी मृदा‘ भी कहा जाता है। इस मिट्टी की जल धारण क्षमता अधिक है। यही कारण है कि यह मिट्टी शुष्क कृषि के लिए अनुकूल है। इस मिट्टी का रासायनिक संघटन इस प्रकार है-

  • फेरिक ऑक्साइड: 11.24%
  • एल्यूमिना: 9.39%
  • जल तथा जीवांश: 5.83%
  • चूना: 1.81%
  • मैग्निशिया: 1.79%

इसकी मिट्टी की मुख्य फसल कपास है। इस मिट्टी में गन्ना, केला, ज्वार, तंबाकू, रेंड़ी, मूँगफली और सोयाबीन की भी अच्छी पैदावार होती है।

4. लैटेराइट मिट्टी (Laterite Soil) किसे कहते है?

लैटेराइट मिट्टी उष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों में पायी जाती है। यह मिट्टी प्राय: उन उष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों में पायी जाती है, जहाँ ऋतुनिष्ठ वर्षा होती है। इस मिट्टी का रंग लाल होता है, लेकिन यह ‘लाल मिट्टी’ से अलग होती है। शुष्क मौसम में शैलों की टूट-फूट से निर्मित होने वाली इस मिट्टी को गहरी लाल लैटराइट तथा भूमिगत जल वाली लैटराइट के रूप में वर्गीकत किया जाता है। गहरी लाल लैटराइट में आइरन ऑक्साइड तथा पोटाश की मात्रा अत्यधिक मिलती है। इसमें उर्वरता कम होती है, ऊँचे स्थलों में यह प्राय: पतली और कंकड़मिश्रित होती है और कृषि के योग्य नहीं रहती, किंतु मैदानी भागों में यह खेती के काम में लाई जाती है। सफ़ेद लैटराइट की उर्वरता सबसे कम होती है और केओलिन की अधिकता के कारण इसका रंग सफ़ेद हो जाता है।

यह मिट्टी तमिलनाडु के पहाड़ी भागों, केरल, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल तथा उड़ीसा के कुछ भागों में,  दक्षिण भारत के पठार, राजमहल तथा छोटानागपुर के पठार, असम इत्यादि में सीमित क्षेत्रों में पाई जाती है। दक्षिण भारत में मैदानी भागों में इसपर धान की खेती होती है और ऊँचे भागों में चाय, कहवा, रबर तथा सिनकोना उपजाए जाते हैं। इस प्रकार की मिट्टी अधिक ऊष्मा और वर्षा के क्षेत्रों में बनती है। इसलिए इसमें ह्यूमस की कमी होती है और निक्षालन अधिक हुआ करता है।

इस मिट्टी का रासायनिक संघटन इस प्रकार है-

  • लोहा- 18.7%
  • सिलिका: 32.62%
  • एल्यूमिना: 25.2%
  • फास्फ़ोरस: 0.7%
  • चूना: 0.42%

5. क्षारयुक्त मिट्टी (Saline and Alkaline Soil) किसे कहते है?

शुष्क और अर्धशुष्क क्षेत्रों, दलदली द अधिक सिंचाई वाले क्षेत्रों में यह मिट्टी पाई जाती है। इन्हे थूर, ऊसर, कल्लहड़, राकड़, रे और चोपन के नामों से भी जाना जाता है। शुष्क भागों में अधिक सिंचाई के कारण एवं अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जल-प्रवाह दोषपूर्ण होने एवं जलरेखा उपर-नीचे होने के कारण इस मिट्टी का जन्म होता है। इस प्रकार की मिट्टी में भूमि की निचली परतों से क्षार या लवण वाष्पीकरण द्वारा उपरी परतों तक आ जाते हैं। इस मिट्टी में सोडियम, कैल्सियम और मैग्निशियम की मात्रा अधिक पायी जाने से प्रायः यह मिट्टी अनुत्पादक हो जाती है।

6. हल्की काली एवं दलदली मिट्टी (Peaty and Other Organic soil) किसे कहते है?

इस मिट्टी में ज़्यादातर जैविक तत्व अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। यह सामान्यतः आद्रप्रदेशों में मिलती है। दलदली मिट्टी उड़ीसा के तटीय भागों, सुंदरवन के डेल्टाई क्षेत्रों, बिहार के मध्यवर्ती क्षेत्रों, उत्तराखंड के अल्मोड़ा और तमिलनाडु के दक्षिण-पूर्वी एवं केरल के तटों पर पाई जाती है।

7. रेतीली मिट्टी (Arid and Desert Soil) किसे कहते है?

यह मिट्टी शुष्क और अर्धशुष्क प्रदेशों जैसे: पश्चिमी राजस्थान और आरवाली पर्वत के क्षेत्रों, उत्तरी गुजरात, दक्षिणी हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पाई जाती है। सिंचाई के सहारे गेंहू, गन्ना, कपास, ज्वार, बाजरा  उगाये जाते हैं। जहाँ सिंचाई की सुविधा नहीं है वहाँ यह भूमि बंजर पाई जाती है।

अन्य प्रकार की विभिन्न मिट्टियां:

पीली-सफेद मिट्टी किसे कहते है?

पीली-सफेद मिट्टी तालाबों, खेतों और दरिया के किनारों पर पाई जाती है। किसी भी व्यक्ति कें रोगों को ठीक करने में इसी तरह की मिट्टी को काम में लिया जाता है।

सज्जी मिट्टी किसे कहते है?

सज्जी को भी एक प्रकार की मिट्टी ही कहा जाता है ये कपड़ों को साफ़ करने के काम मे आती है।

मुल्तानी मिट्टी किसे कहते है?

ये एक ख़ास किस्म की मिट्टी होती है, जिसे स्त्रियां उबटन की तरह शरीर पर मलती है और बालों पर भी लगाती है। मुल्तानी मिट्टी लगाने से स्त्रियों की त्वचा और बालों में चमक आ जाती है।

बालू मिट्टी किसे कहते है?

बालू भी मिट्टी को ही बोला जाता है जो किसी भी मनुष्य के लिए उसी तरह जरूरी है जिस तरह भोजन और पानी। लेकिन बालू मिट्टी के गुणों को केवल प्राकृतिक चिकित्सक ही अच्छी तरह जानते हैं। प्राकृतिक दशा में खाई जाने वाली खाने की चीज़ें जैसे साग-सब्जी, खीरा, ककड़ी आदि के साथ हमेशा बालू मिट्टी का कुछ भाग ज़रूर होता है, जिसे हम जानकारी ना होने के कारण गंवा देते है। ये बालू मिट्टी के कण हमारी भोजन पचाने की क्रिया को ठीक रखने मे मदद करते हैं।

पर्वतीय मिट्टी किसे कहते है?

पर्वतीय मिट्टी में कंकड़ एवं पत्थर की मात्रा अधिक होती है। पर्वतीय मिट्टी में भी पोटाश, फास्फोरस एवं चूने की कमी होती है। पहाड़ी क्षेत्र में खास करके बागबानी कृषि होती है। पहाड़ी क्षेत्र में ही झूम खेती होती है। झूम खेती सबसे ज्यादा नागालैंड में की जाती है। पर्वतीय क्षेत्र में सबसे ज्यादा गरम मसाले की खेती की जाती है।

दोमट मिट्टी किसे कहते है?

दोमट एक प्रकार की मिट्टी है जो फसलों के लिए अत्यन्त उर्वर (उपजाऊ)) होती है। इसमें लगभग 40% सिल्ट, 20% चिकनी मिट्टी तथा शेष 40% बालू होता है। पानी तथा वायु के प्रवेश हेतु अर्थात् अधिक छिद्रिल होने के कारण फसलों की उर्वरा शक्ति अधिक होती है। ऐसी मिट्टी अपने कुल भार का 50% पानी रोकने की क्षमता रखती है। इस मिट्टी में पोषक पदार्थों की मात्रा भी अधिक होती है।

दोमट मिट्टी में सिल्ट, बालू और चिकनी मिट्टी के अंश अलग-अलग होने से भिन्न-भिन्न प्रकार के दोमट बनते हैं जैसे बलुई दोमट, सिल्टी दोमट, चिकनी दोमट, बलुई चिकनी दोमट आदि। चिकनी मिट्टी की अपेक्षा दोमट मिट्टी में अधिक पोषक पदार्थ, अधिक नमी, अधिक ह्यूमस होता है। दोमट मिट्टी की जुताई चिकनी मिट्टी की अपेक्षा आसान होती है। इसमें सिल्टी मिट्टी की अपेक्षा हवा और पानी को छानने तथा जल-निकास की बेहतर क्षमता होती है।

दोमट मिट्टी बागवानी तथा कृषि कार्यों के लिए उत्तम मानी जाती है। यदि किसी बलुई या चिकनी मिट्टी में भी अधिक मात्रा में जैविक पदार्थ मिले हों तो उसके गुण भी दोमट जैसे ही होंगे।

इन्हें भी पढ़े: भारत में कृषि का महत्व और प्रमुख फसलें

4 comments

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *