राजा राममोहन राय का जीवन परिचय एवं उनसे जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी

✅ Published on September 27th, 2021 in प्रसिद्ध व्यक्ति, समाज सुधारक

इस अध्याय के माध्यम से हम जानेंगे राजा राममोहन राय (Raja Ram Mohan Roy) से जुड़े महत्वपूर्ण एवं रोचक तथ्य जैसे उनकी व्यक्तिगत जानकारी, शिक्षा तथा करियर, उपलब्धि तथा सम्मानित पुरस्कार और भी अन्य जानकारियाँ। इस विषय में दिए गए राजा राममोहन राय से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को एकत्रित किया गया है जिसे पढ़कर आपको प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने में मदद मिलेगी। Raja Ram Mohan Roy Biography and Interesting Facts in Hindi.

राजा राममोहन राय के बारे में संक्षिप्त जानकारी

नामराजा राममोहन राय (Raja Ram Mohan Roy)
जन्म की तारीख22 मई 1772
जन्म स्थानबंगाल, भारत
निधन तिथि27 सितम्बर 1833
माता व पिता का नामतारिणी देवी / रमाकांत रॉय
उपलब्धि1834 - इंग्लैण्ड का दौरा करने वाले प्रथम भारतीय
पेशा / देशपुरुष / इतिहासकार / भारत

राजा राममोहन राय (Raja Ram Mohan Roy)

राजा राममोहन राय को आधुनिक भारत का जनक कहा जाता है। वे ब्रह्म समाज के संस्थापक, भारतीय भाषायी प्रेस के प्रवर्तक, जनजागरण और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता तथा बंगाल में नव-जागरण युग के पितामह थे। धार्मिक और सामाजिक विकास के क्षेत्र में राजा राममोहन राय का नाम सबसे अग्रणी है।

राजा राममोहन राय का जन्म 22 मई, 1772 ई. में राधानगर गाँव जिला हुगली के बंबंगाल प्रेसीडेंसी में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम रमाकांत रॉय और माता का नाम तारिणी देवी था। इनके पिता वैष्णव संप्रदाय के थे तथा इनकी माता वीर-शैव संप्रदाय की थी।
राजा राममोहन राय की मृत्यु 27 सितंबर 1833 (आयु 61 वर्ष) को स्टेपलटन, ब्रिस्टल , इंग्लैंड में हुई थी। इन्हें दक्षिणी ब्रिस्टल में अरनोस वेले कब्रिस्तान में दफनाया गया था।
राम मोहन राय की प्रारंभिक शिक्षा की प्रकृति और विषयवस्तु विवादित है। एक दृष्टिकोण यह है कि "राम मोहन ने अपनी औपचारिक शिक्षा गाँव के पाठशाला में शुरू की जहाँ उन्होंने बंगाली और कुछ संस्कृत और फ़ारसी सीखी। बाद में कहा जाता है कि उन्होंने पटना के एक मदरसे में फ़ारसी और अरबी का अध्ययन किया और उसके बाद उन्हें सीखने के लिए बनारस भेजा गया।
15 वर्ष की आयु तक उन्हें बंगाली, संस्कृत, अरबी तथा फ़ारसी का ज्ञान हो गया था। किशोरावस्था में उन्होने काफी भ्रमण किया। उन्होने 1803-1814 तक ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए भी काम किया। राजा राममोहन राय ने तीन बार शादी की थी। उनकी पहली पत्नी का देहांत बहुत ही जल्दी हो गया था, जिसके बाद उन्होने ने दूसरी शादी की जिससे उन्हें दो पुत्रों राधाप्रसाद (1800) और रामप्रसाद (1812) की प्राप्ति हुई परंतु दुर्भाग्यवश उनकी दूसरी पत्नी का भी देहांत हो गया, जिसके बाद उन्होने तीसरी शादी की। राम मोहन राय की शुरू से ही यह इच्छा थी की वह भारतीयों को शिक्षित कर समाज की कुरीतियों को दूर करें इसलिए उन्होने वर्ष 1817 में, डेविड हरे के सहयोग से कलकत्ता में हिंदू कॉलेज की स्थापना की । उन्होंने वर्ष 1821 में ‘यूनीटेरियन एसोसिएशन" की स्थापना की थी। हिन्दू समाज की कुरीतियों के घोर विरोधी होने के कारण 1828 में उन्होंने ‘ब्रह्म समाज" नामक एक नये प्रकार के समाज की स्थापना की थी। 1831 से 1834 तक अपने इंग्लैंड प्रवास काल में राममोहन जी ने ब्रिटिश भारत की प्राशासनिक पद्धति में सुधार के लिए आन्दोलन किया। ब्रिटिश संसद के द्वारा भारतीय मामलों पर परामर्श लिए जाने वाले वे प्रथम भारतीय थे। उन्होंने 1833 ई. के समाचारपत्र नियमों के विरुद्ध प्रबल आन्दोलन चलाया। समाचार पत्रों की स्वतंत्रता के लिए उनके द्वारा चलाये गये आन्दोलन के द्वारा ही 1835 ई. में समाचार पत्रों की अज़ादी के लिए मार्ग बना। राजा राम मोहन राय ने ही अपने अथक प्रयासों से वर्षो से चली आ रही ‘सती प्रथा" को ग़ैर-क़ानूनी दंण्डनीय घोषित करवाया। जिसके कारण लॉर्ड विलियम बैंण्टिक ने 1829 में सती प्रथा को समाप्त करने का निर्णय लिया।
उन्हें मुग़ल सम्राट की ओर से ‘राजा" की उपाधि दी गयी थी। 1983 में, ब्रिस्टल के संग्रहालय और आर्ट गैलरी में राम मोहन रॉय पर एक पूर्ण पैमाने पर प्रदर्शनी आयोजित की गई थी। हेनरी पेरोनेट ब्रिग्स द्वारा उनका 1831 का विशाल चित्र अभी भी वहीं लटका हुआ है और 1873 में सर मैक्स मुलर की एक चर्चा का विषय था। कॉलेज ग्रीन में ब्रिस्टल के केंद्र में, आधुनिक कोलकाता के मूर्तिकार निरंजन प्रधान द्वारा राजा की पूर्ण आकार की कांस्य प्रतिमा है। प्रधान द्वारा एक और पर्दाफाश, ज्योति बसु द्वारा ब्रिस्टल को उपहार में दिया गया, ब्रिस्टल के सिटी हॉल के मुख्य फ़ोयर के अंदर बैठता है। स्टेपलटन के एक पैदल मार्ग को "राजा राममोहन वॉक" नाम दिया गया है। स्टैपलटन ग्रोव की बाहरी पश्चिम दीवार पर 1933 की ब्रह्म पट्टिका है, और बगीचे में उनका पहला दफन स्थान रेलिंग और एक ग्रेनाइट स्मारक पत्थर से चिह्नित है। अर्नोस वेले में उनकी कब्र और चेट्री को अंग्रेजी विरासत द्वारा ग्रेड II * ऐतिहासिक स्थल के रूप में सूचीबद्ध किया गया है और आज कई आगंतुक आकर्षित करते हैं।

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