नंद वंश का इतिहास

✅ Published on September 3rd, 2020 in प्राचीन भारतीय राजवंश, सामान्य ज्ञान अध्ययन

नंद वंश का इतिहास एवं महत्वपूर्ण तथ्यों की सूची: (Important History and Facts about Nanda Empire in Hindi)

नंद वंश का इतिहास:

नंद वंश मगध, बिहार का लगभग 344 ई.पू. से 322 ई.पू. के बीच का शासक वंश था, जिसका आरंभ महापद्मनंद से हुआ था।। 344 ई. पू. में महापद्यनन्द नामक व्यक्‍ति ने नन्द वंश की स्थापना की। पुराणों में इसे महापद्म तथा महाबोधिवंश में उग्रसेन कहा गया है। यह नाई जाति का था। उसे महापद्म एकारट, सर्व क्षत्रान्तक आदि उपाधियों से विभूषित किया गया है। महापद्म नन्द के प्रमुख राज्य उत्तराधिकारी हुए हैं- उग्रसेन, पंडूक, पाण्डुगति, भूतपाल, राष्ट्रपाल, योविषाणक, दशसिद्धक, कैवर्त, धनानन्द। इसके शासन काल में भारत पर आक्रमण सिकन्दर द्वारा किया गया। सिकन्दर के भारत से जाने के बाद मगध साम्राज्य में अशान्ति और अव्यवस्था फैली। धनानन्द एक लालची और धन संग्रही शासक था, जिसे असीम शक्‍ति और सम्पत्ति के बावजूद वह जनता के विश्‍वास को नहीं जीत सका। उसने एक महान विद्वान ब्राह्मण चाणक्य को अपमानित किया था।

  • चाणक्य ने अपनी कूटनीति से धनानन्द को पराजित कर चन्द्रगुप्त मौर्य को मगध का शासक बनाया।
  • महापद्मनन्द पहला शासक था जो गंगा घाटी की सीमाओं का अतिक्रमण कर विन्ध्य पर्वत के दक्षिण तक विजय पताका लहराई।
  • नन्द वंश के समय मगध राजनैतिक दृष्टि से अत्यन्त समृद्धशाली साम्राज्य बन गया।
  • व्याकरण के आचार्य पाणिनी महापद्मनन्द के मित्र थे।
  • वर्ष, उपवर्ष, वर, रुचि, कात्यायन जैसे विद्वान नन्द शासन में हुए।
  • शाकटाय तथा स्थूल भद्र धनानन्द के जैन मतावलम्बी अमात्य थे।

नंद वंश के राजा:

बौद्ध, जैन और पुराणिक परंपराएं बताती हैं कि 9 नंद राजा थे, लेकिन इन राजाओं के नामों पर स्रोत काफी भिन्न हैं। ग्रीको-रोमन के लेखों अनुसार, नंदा शासन ने दो पीढ़ियों को फैलाया। उदाहरण के लिए, रोमन इतिहासकार कर्टियस (पहली शताब्दी सीई) का सुझाव है कि राजवंश का संस्थापक एक नाई-राजा था, और उसका पुत्र वंश का अंतिम राजा था, जिसे चंद्रगुप्त ने उखाड़ फेंका था। ग्रीक खातों में केवल एक नंद राजा का नाम है- एग्रामेस या ज़ेंडरडेम्स-जो सिकंदर का समकालीन था। “एनग्रामम्स” संस्कृत शब्द “ऑग्रेसन्या” (सचमुच “उग्रसेन का पुत्र या वंशज” हो सकता है, उग्रसेन बौद्ध परंपरा के अनुसार वंश के संस्थापक का नाम है)।

पुराण, भारत में संकलित  4 वीं शताब्दी सीई (लेकिन शायद पहले के स्रोतों पर आधारित), यह भी बताता है कि नंदों ने दो पीढ़ियों तक शासन किया। पुराण परंपरा के अनुसार, राजवंश के संस्थापक महापद्म थे: मत्स्य पुराण उन्हें 88 साल का एक अविश्वसनीय रूप से लंबा शासन प्रदान करता है, जबकि वायु पुराण में केवल 28 वर्षों के रूप में उनके शासनकाल की लंबाई का उल्लेख है। पुराणों में आगे कहा गया है कि महापद्म के 8 पुत्रों ने कुल 12 वर्षों तक उसके बाद उत्तराधिकार में शासन किया, लेकिन इनमें से केवल एक पुत्र का नाम: सुकालपा। वायु पुराण की एक लिपि ने उन्हें “सहल्या” नाम दिया है, जो स्पष्ट रूप से बौद्ध पाठ दिव्यवदना में वर्णित “सहालिन” से मेल खाती है। विष्णु पुराण के एक टीकाकार धुंडीराज ने नंदा राजाओं में से एक का नाम सर्वथा-सिद्धि बताया और कहा कि उनका पुत्र मौर्य था, जिसका पुत्र चंद्रगुप्त मौर्य था। हालाँकि, पुराण स्वयं नंदा और मौर्य राजवंशों के बीच किसी भी संबंध की बात नहीं करते हैं।

नन्द वंश के राजाओं की सूची नीचे दी गई है:-

  1. उग्रसेन
  2. पंडूक
  3. पाण्डुगति
  4. भूतपाल
  5. राष्ट्रपाल
  6. योविषाणक
  7. दशसिद्धक
  8. कैवर्त
  9. धनानन्द

नंद वंश के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य:

  • नंद शासक मौर्य साम्राज्य के पूर्ववर्ती राजा थे।
  • स्थानीय और जैन परम्परावादियों से पता चलता है कि इस वंश के संस्थापक महापद्म, जिन्हें महापद्मपति या उग्रसेन भी कहा जाता है, समाज के निम्न वर्ग के थे।
  • महापद्म ने अपने पूर्ववर्ती शिशुनाग राजाओं से मगध की बाग़डोर और सुव्यवस्थित विस्तार की नीति भी जानी। उनके साहस पूर्ण प्रारम्भिक कार्य ने उन्हें निर्मम विजयों के माध्यम से साम्राज्य को संगठित करने की शक्ति दी।
  • पुराणों में उन्हें सभी क्षत्रियों का संहारक बतलाया गया है। उन्होंने उत्तरी, पूर्वी और मध्य भारत स्थित इक्ष्वाकु, पांचाल, काशी, हैहय, कलिंग, अश्मक, कौरव, मैथिल, शूरसेन और वितिहोत्र जैसे शासकों को हराया। इसका उल्लेख स्वतंत्र अभिलेखों में भी प्राप्त होता है, जो नन्द वंश के द्वारा गोदावरी घाटी- आंध्र प्रदेश, कलिंग- उड़ीसा तथा कर्नाटक के कुछ भाग पर कब्ज़ा करने की ओर संकेत करते हैं।
  • महापद्म के बाद पुराणों में नंद वंश का उल्लेख नाममात्र का है, जिसमें सिर्फ सुकल्प (सहल्प, सुमाल्य) का ज़िक्र है, जबकि बौद्ध महाबोधिवंश में आठ नामों का उल्लेख है। इस सूची में अंतिम शासक धनानंद का उल्लेख संभवत: अग्रामी या जेन्ड्रामी के रूप में है और इन्हें यूनानी स्त्रोतों में सिकंदर महान का शक्तिशाली समकालीन बताया गया है।

  • इस वंश के शासकों की राज्य-सीमा व्यास नदी तक फैली थी। उनकी सैनिक शक्ति के भय से ही सिकंदर के सैनिकों ने व्यास नदी से आगे बढ़ना अस्वीकार कर दिया था।
  • कौटिल्य की सहायता से चंद्रगुप्त मौर्य ने 322 ई. पूर्व में नंदवंश को समाप्त करके मौर्य वंश की नींव डाली।
  • इस वंश में कुल नौ शासक हुए – महापद्मनंद और बारी-बारी से राज्य करने वाले उसके आठ पुत्र।
  • इन दो पीढ़ियों ने 40 वर्ष तक राज्य किया।
  • इन शासकों को शूद्र माना जाता है।
  • नंद वंश का संक्षिप्त शासनकाल मौर्य वंश के लंबे शासन के साथ प्रारंभिक भारतीय इतिहास में महत्त्वपूर्ण संक्रमण काल को दर्शाता है।
  • गंगा नदी में (छठी से पांचवी शताब्दी ई.पू.) भौतिक संस्कृति में बदलाव आया, जिसका विशेष लक्षण कृषि में गहनाता और लौह तकनीक का बढता इस्तेमाल था। इससे कृषि उत्पादन में उपयोग से अधिक वृद्धि हुई और वाणिज्यिक और शहरी केंद्रों के विकास को बढ़ावा मिला।
  • सिकंदर के काल में नंद की सेना में लगभग 20,000 घुड़सवार, 2,00,000 पैदल सैनिक, 2000 रथ और 3000 हाथी। प्रशासन में नंद राज्य द्वारा उठाए गए क़दम कलिंग (उड़ीसा) में सिचाई परियोजनाओं के निर्माण और एक मंत्रिमंडलीय परिषद के गठन से स्पष्ट होते हैं।

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