माउंट आबू राजस्थान के दिलवाड़ा जैन मंदिर का इतिहास तथा महत्वपूर्ण जानकारी

✅ Published on July 6th, 2018 in प्रसिद्ध आकर्षण, प्रसिद्ध मंदिर

दिलवाड़ा जैन मंदिर, माउंट आबू, (राजस्थान) के बारे में जानकारी: (Dilwara Jain Temples, Mount Abu, Rajasthan GK in Hindi)

प्रत्येक देश की अपनी एक विशेषता होती है ठीक इसी प्रकार भारत में भी कई विशेषताएं पाई जाती है। देश में विभिन्न धर्म के लोग निवास करते है और सभी लोग अपने-अपने धर्मो का पालन करते है। भारत में जैन धर्म का इतिहास काफी पुराना रहा है, जिसकी छाप भारत में सर्वत्र देखी जा सकती है। जैन धर्म के अनुयायियों ने कई ऐतहासिक मन्दिरों का निर्माण करवाया है, जिसमें से एक दिलवाड़ा जैन मंदिर भी है जोकि राजस्थान के माउंट आबू में स्थित है।

दिलवाड़ा जैन मंदिर का संक्षिप्त विवरण: (Quick Info about Dilwara Jain Temples)

स्थान माउंट आबू, राजस्थान (भारत)
स्थापना 11वीं से 13वीं शताब्दी ई. के बीच
निर्माता विमल शाह, वास्तुपाल और तेजपाल
प्रकार मंदिर

दिलवाड़ा जैन मंदिर का इतिहास: (Dilwara Jain Temples History in Hindi)

दिलवाड़ा मंदिर का इतिहास जैन धर्म से जुड़ा हुआ है। इसका निर्माण 11वीं से 13वीं शताब्दी के बीच प्राचीन भारत के दो प्रसिद्ध राजाओ वास्तुपाल और तेजपाल द्वारा कराया गया था, जो 1231 ई. में पूर्ण रूप से बनकर तैयार हुआ था। यह मंदिर जैन धर्म के प्रथम व् प्रसिद्ध तीर्थंकर ऋषभदेव को समर्पित किया गया था।

जैन धर्म के बारे में जानकारी:

यह भारत के सबसे प्राचीन धर्मो में से एक है, जिसका अर्थ है “जिन द्वारा प्रवर्तित धर्म” । इस धर्म का प्रारंभ जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव आदिनाथ द्वारा किया गया था। इस धर्म की उत्पति का प्रमुख कारण समाज से अशांति व् हीन भावना को खत्म करना था। इस धर्म को और भी प्रसिद्ध बनाने का कार्य जैन धर्म के 24वें तीर्थकर वर्धमान महावीर जैन ने किया था, जो जैन धर्म के अंतिम तीर्थकर थे।

दिलवाड़ा जैन मंदिर के बारे में रोचक तथ्य: (Interesting Facts about Dilwara Jain Temples in Hindi)

  • यह मंदिर राजस्थान के माउंट आबू शहर के केंद्र से लगभग 2.5 कि.मी. की दूरी पर स्थित है।
  • इस मंदिर के सबसे प्राचीन मंदिर “विमल वसही” का निर्माण करने में लगभग 14 साल लगे और पूरे मंदिर के निर्माण में लगभग 18 करोड़ रुपये की लागत आई।
  • इस मन्दिर के निर्माण में लगभग 1200 श्रमिकों और 1500 शिल्पकार की आवश्यकता पड़ी थी।
  • इस मंदिर के पीतलहर मन्दिर में ऋषभदेव की पंचधातु और पीतल से बनी मूर्ति है, जिसका वजन लगभग 4,000 किलोग्राम है।
  • यह मंदिर जैन वास्तुकला और भारतीय वास्तुकला का सर्वश्रेष्ट उदाहरण है, जिसमे सफेद संगमरमर पत्थरो का उपयोग किया गया है, जो अरासुरी पहाड़ियों से लाये गए थे।
  • यह मंदिर पांच भागो में विभाजित है जिसमे सबसे प्राचीन मंदिर “विमल वसही” है जो ऋषभदेव को, दूसरा “मंदिर लुन वसही” नेमीनाथ को, तीसरा मंदिर “पीतलहर” ऋषभदेव को, चौथा मंदिर “पार्श्वनाथ” पार्श्वनाथ को और अंतिम मंदिर “महावीर स्वामी” अन्तिम जैन तीर्थंकर महावीर को समर्पित है।
  • विमल वसही मंदिर में स्थित हस्तीशाला का निर्माण 1147-49 में विमलाशा के वंशज पृथ्वी विपाल ने किया था, जिसमे हाथियों की कई मुर्तियाँ सम्मिलित है।
  • विमल वसही मंदिर में नवचौकी भी स्थित है जिसमे नौ आयतकर छत सम्मिलित है, जिसपर विभिन्न प्रकार की संरचना व सुंदर नक्काशी की गई है जो अलंकृत खंभो पर टिके हैं।
  • लुन वसही मंदिर के मुख्य महाकक्ष में एक मंडप स्थित है जिसके केंद्र में एक विशाल गुंबद है जिस पर विभिन्न प्रकार की नक्काशी की गई है और उसके बीच में एक विशाल सजावटी लटकन टांगी गई है।
  • दिलवाड़ा मंदिर का सबसे विशाल मंदिर पार्श्वनाथ है, जिसमें तीन मंजिला इमारत शामिल है और जिसमे चार बड़े मंडप भी सम्मिलित है जिन पर अतिसुंदर नक्काशी की गई हैं।

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