व्योमेश चन्द्र बनर्जी का जीवन परिचय एवं उनसे जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी

इस अध्याय के माध्यम से हम जानेंगे व्योमेश चन्द्र बनर्जी (Womesh Chunder Bonnerjee) से जुड़े महत्वपूर्ण एवं रोचक तथ्य जैसे उनकी व्यक्तिगत जानकारी, शिक्षा तथा करियर, उपलब्धि तथा सम्मानित पुरस्कार और भी अन्य जानकारियाँ। इस विषय में दिए गए व्योमेश चन्द्र बनर्जी से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को एकत्रित किया गया है जिसे पढ़कर आपको प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने में मदद मिलेगी। Womesh Chunder Bonnerjee Biography and Interesting Facts in Hindi.

व्योमेश चन्द्र बनर्जी का संक्षिप्त सामान्य ज्ञान

नामव्योमेश चन्द्र बनर्जी (Womesh Chunder Bonnerjee)
जन्म की तारीख29 दिसम्बर 1844
जन्म स्थानकलकत्ता, पश्चिम बंगाल(भारत)
निधन तिथि21 जुलाई 1906
माता व पिता का नामसरस्वती देवी / गिरीश चन्द्र बनर्जी
उपलब्धि1885 - भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष
पेशा / देशपुरुष / राजनीतिज्ञ / भारत

व्योमेश चन्द्र बनर्जी (Womesh Chunder Bonnerjee)

व्योमेश चन्द्र बनर्जी एक प्रसिद्ध भारतीय बैरिस्टर एवं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष थे। ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स के लिये चुनाव लड़ने वाले वे प्रथम भारतीय थे वह कोलकाता उच्च न्यायालय के प्रमुख वक़ील थे। ये भारत में अंग्रेज़ी शासन से प्रभावित थे और उसे देश के लिये अच्छा मानते थे।

व्योमेश चन्द्र बनर्जी का जन्म 29 दिसम्बर 1844 को कलकत्ता, पश्चिम बंगाल में हुआ था। ये एक उच्च मध्यम वर्ग के कुलीन ब्राह्मण परिवार से थे| इनके पिता का नाम पिता का नाम गिरीश चंद्र बैनर्जी और माता का नाम सरस्वती देवी था|
व्योमेश चन्द्र बनर्जी का निधन 21 जुलाई 1906 (आयु 61 वर्ष) को क्रॉयडन, लंदन, इंग्लैंड में हुआ था।
व्योमेश चन्द्र बनर्जी ने शुरुआती अध्यन ओरिएंटल सेमिनरी और हिंदू स्कूल में अध्ययन किया। सन 1859 में, उन्होंने हेमंगिनी मोतीलाल से शादी की। उनके करियर की शुरुआत 1862 में हुई थी, जब वे एक क्लर्क के रूप में कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट के वकीलों, डब्ल्यू. पी. गिलंडर्स, की फर्म से जुड़े। इस पद पर उन्होंने कानून का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया जिससे उनके बाद के करियर में काफी मदद मिली। 1864 में उन्हें बॉम्बे के श्री आरजे जीजीभाई से छात्रवृत्ति के माध्यम से इंग्लैंड भेजा गया, जहां वे मध्य मंदिर में शामिल हो गए। 1868 में कलकत्ता लौटने पर, उन्होंने सर चार्ल्स पॉल में एक संरक्षक पाया। , कलकत्ता उच्च न्यायालय के बैरिस्टर-एट-लॉ। एक अन्य बैरिस्टर, जे. पी. केनेडी ने भी एक वकील के रूप में अपनी प्रतिष्ठा स्थापित करने में उनकी बहुत मदद की। कुछ ही वर्षों में वह हाईकोर्ट में बैरिस्टर बन गए। वह एक स्थायी वकील के रूप में कार्य करने वाले पहले भारतीय थे
1865 में दादाभाई नौरोजी ने लंदन भारतीय समाज की स्थापना की और बैनर्जी को इसका महासचिव बनाया गया। संबर 1866 में, नौरोजी लंदन भारतीय समाज को भंग कर दिया और पूर्व भारतीय संघ का गठन किया। जब बैनर्जी कांग्रेस के अध्यक्ष बने, तो नैरोजी ने अर्डले नॉर्टन और विलियम डिग्बी के साथ मिलकर लंदन में कांग्रेस राजनीतिक एजेंसी, के नाम से कांग्रेस की एक शाखा खोली। 1868 में वह कलकत्ता वापस आ गए और उन्होंने कलकत्ता उच्च न्यायालय में बैरिस्टर-एट-लॉ की नौकरी कर ली| बैनर्जी, लंदन की संसद और न्यायालयों की अपनी यात्राओं से बहुत प्रभावित थे, जल्द ही वह भारत सरकार के युवा और सबसे सुवक्ता, वकीलों में से एक बन गए। 1892 में व्योमेश चंद्र बनर्जी को फिर से इलाहाबाद में भारत की राष्ट्रीय कांग्रेस के एक बड़े सातवें सत्र की अध्यक्षता करने के लिए आमंत्रित किया गया। इस अधिवेशन में उन्होंने भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए उसकी योग्यता साबित करने की स्थिति की निंदा की। इसी वर्ष बनर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय के सीनेट की तरफ से विधान परिषद में प्रतिनिधित्व करने के लिए निर्वाचित किया गया| वर्ष 1885 में बम्बई में हुए अधिवेशन में उन्हें ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस" का प्रथम अध्यक्ष चुना गया था। यह सत्र 28 दिसम्बर से 31 दिसम्बर तक चला था और 72 सदस्यों ने इसमें भाग लिया था। 1892 में बैनर्जी को लिबरल पार्टी ने बैरो इन फर्नेस सीट से हाउस आफ कॉमन्स के लिये अपना उम्मीदवार बनाया, परन्तु बैनर्जी अपने प्रतिद्वंदी चार्ल्स सेज़र से हार गए। इसी चुनाव में दादाभाई नैरोजी ने फिन्सबरी सीट से अपने प्रतिद्वंदी को 5 वोटों से हरा दिया| इस प्रकार 1893 में नौरोजी ब्रिटिश संसद के पहले भारतीय सदस्य बने। दादाभाई नैरोजी, व्योमेश चंद्र बनर्जी बदरुद्दीन तैय्यबजी ने मिलकर इंग्लैण्ड में इंग्लैंड में भारतीय संसदीय समिति की स्थापना भी की। 1901 में कलकत्ता बार से सेवानिवृत्त होने के बाद वह लंदन चले गए, यहाँ उन्होंने प्रिवी कौंसिल से अपनी वकालत जारी रखी, परन्तु 1904 में उनकी आँखों की रौशनी जाती रही| व्योमेश चन्द्र बैनर्जी की अपने प्रिय मित्र गोपाल कृष्ण गोखले, जिन्होंने बनारस कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता भी की थी सन् 1901 में वे कलकत्ता बार से सेवानिवृत्त होने के बाद वह लंदन (इंग्लैंड) में जाकर बस गये थे। ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स के लिये चुनाव लड़ने वाले वे प्रथम भारतीय थे (किन्तु वे जीत नहीं पाये)। व्योमेश बनर्जी अंग्रेज़ी चाल-ढाल के इतने कट्टर अनुयायी थे, कि इन्होंने स्वयं अपने पारिवारिक नाम ‘बनर्जी" का अंग्रेज़ीकरण करके उसे ‘बोनर्जी" कर दिया था।

📅 Last update : 2021-12-29 00:30:25