1857 की क्रांति (प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम) से संबंधित जानकारी:

लॉर्ड कैनिंग के गवर्नर-जनरल के रूप में शासन करने के दौरान ही 1857 ई. की महान क्रान्ति हुई। 1857 की क्रांति की शुरुआत 10 मई, 1857 ई. को मेरठ से हुई थी, जो धीरे-धीरे कानपुर, बरेली, झांसी, दिल्ली, अवध आदि स्थानों पर फैल गया। इस क्रान्ति की शुरुआत तो एक सैन्य विद्रोह के रूप में हुई, परन्तु कालान्तर में उसका स्वरूप बदल कर ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध एक जनव्यापी विद्रोह के रूप में हो गया, जिसे भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम कहा गया।

1857 ई. की इस महान क्रान्ति के स्वरूप को लेकर विद्धान एक मत नहीं है। इस बारे में विद्वानों ने अपने अलग-अलग मत प्रतिपादित किये हैं, जो इस प्रकार हैं-'सिपाही विद्रोह', 'स्वतन्त्रता संग्राम', 'सामन्तवादी प्रतिक्रिया', 'जनक्रान्ति', 'राष्ट्रीय विद्रोह', 'मुस्लिम षडयंत्र', 'ईसाई धर्म के विरुद्ध एक धर्म युद्ध' और 'सभ्यता एवं बर्बरता का संघर्ष' आदि।

1857 की क्रांति के प्रमुख कारण

उस समय बहुत से ऐसे कारण उत्पन्न हुए जिसकी वजह से भारतीयों में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की भावना जागी और 1857 की क्रांति हुई थी, नीचे उन्हीं कारणों को मुख्य बिन्दु में बताया गया है:

  • राजनीतिक कारण: राजनीतिक कारणों में लॉर्ड वैलेजली सहायक संधि, लॉर्ड डलहौजी की लैप्स की नीति, झांसी के उत्तराधिकारी पर रोक, नाना साहब की पेंशन बंद करना, सतारा और नागपुर पर ब्रिटिश का कब्जा, जमींदारो तथा किसानों से उनकी जमीन छिनना आदि 1857 की क्रांति के प्रमुख राजनीतिक कारण थे।
  • आर्थिक कारण: भारतीय कारीगरों से उनकी रोजी-रोटी छिनना, अंग्रेज़ो की व्यापारिक नीति और ब्रिटिश साम्राज्य की स्थायी बंदोबस्त की नीति, अत्यधिक कर लगाना आदि 1857 की क्रांति के प्रमुख आर्थिक कारण थे।
  • सामाजिक तथा धार्मिक कारण: 1856 का धार्मिक निर्योग्यता अधिनियम, सती प्रथा को समाप्त करना, अंग्रेजी शिक्षा और ईसाई प्रचारकों द्वारा अन्य धर्मों की निंदा करना आदि जैसे 1857 की क्रांति के प्रमुख सामाजिक तथा धार्मिक कारण शामिल थे।
  • सैनिक कारण: भारतीय सैनिकों को समुद्र पर लड़ने के लिए भेजना, भारतीय सैनिकों के साथ अभद्र व्यवहार, चर्बी वाले कारतूस का जबरन उपयोग करना और वेतन, पदोन्नति व तैनाती में भारतीयों के साथ भेदभाव आदि 1857 की क्रांति प्रमुख सैनिक कारण थे।

ऊपर दिए गए 1857 की क्रांति के प्रमुख कारणों को नीचे विस्तारपूर्वक बताया गया है।

1857 की क्रांति के राजनीतिक कारण

  • लॉर्ड वैलेजली सहायक संधि- वर्ष 1798 ई॰ में भारत के तत्कालिक गवर्नर-जनरल लॉर्ड वैलेजली ने भारत के सभी राज्यों के साथ सहायक संधि की थी, जिसके तहत 1. सभी सहयोगी राजाओं के भूक्षेत्र पर ब्रिटिश सैन्य टुकड़ियाँ तैनात रहेंगी, उन सैन्य टुकड़ियों के रख-रखाव का खर्चा राजा ही उठाएगा 3. राजा के दरबार में एक ब्रिटिश रेजीडेंट नियुक्त किया जाएगा जो प्रत्येक खबर गवर्नर-जनरल को भेजेगा और 5 राजा किसी और शासक के साथ न तो कोई संधि करेगा और न ही ब्रिटिश संधि को तोड़ेगा। इन सभी बातों को शासको पर जबर्दस्ती थोपा गया था, जिस कारण उनके मन में एक व्यापक आक्रोश का जन्म होने लगा।
  • लॉर्ड डलहौजी की लैप्स की नीति- वर्ष 1848 में और तत्कालिक गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी ने एक ऐसा कानून बनाया जिसके तहत अगर किसी भारतीय शासक का कोई उत्तराधिकारी नहीं है तो उस राज्य का शासन भविष्य में ब्रिटिश सरकार ही करेगी। इस कानून को हड़प का कानून कहा जाने लगा विभिन्न शासक इस कानून पर अपना क्रोध दिखाने लगे थे, और इस क्रोध को और अधिक हवा 1857 के दौरान मिली।
  • झांसी के उत्तराधिकारी पर रोक और नाना साहब की पेंशन बंद- जब झाँसी के नरेश गंगाधर राओ का देहांत हो गया तो रानी लक्ष्मीबाई ने एक दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी बनाने की इच्छा जाहीर की परंतु ब्रिटिश सरकार ने उन्हे इसकी अनुमति नहीं दी और झांसी पर अपना शासन चालू कर दिया इससे झाँसी की रानी और लोगो में ब्रिटिश सरकार के प्रति गुस्सा बढ़ने लगा। नाना साहब पेशवा बाजीराओ द्वितीय के दत्तक पुत्र थे। पेशवा की मृत्यु के बाद मराठा साम्राज्य का स्थान भी ब्रिटिश साम्राज्य ने ले लिया और नाना साहब को मिलने वाली पेंशन भी रुकवा दी, जिस कारण कानपुर के लोगो ने ब्रिटिश सरकरर का विरोध करना शुरू कर दिया।
  • सतारा और नागपुर पर ब्रिटिश का कब्जा- वर्ष 1848 में सतारा के शासक शाहजी की मृत्यु के बाद सतारा पर भी ब्रिटिश साम्राज्य ने लैप्स कानून के तहत अपना कब्जा जमा लिया जिस कारण सतारा के सैनिकों में ब्रिटिश सरकार के प्रति गुस्सा जन्म लेने लगा। इसके तुरंत बाद नागपूर के साथ भी ब्रिटिश सरकार ने वही किया जोकि सतारा के साथ किया गया था। दोनों ही क्षेत्रो के सैनिको और किसानो के मन में ब्रिटिश सरकार को लेकर नकारात्मक विचार उत्पन्न होने लगे थे।
  • जमींदारो तथा किसानों से उनकी जमीन छिनना- ब्रिटिश सरकार ने भारत के अलग-अलग प्रांत अधिक से अधिक कर लगा रखा था और कुछ महत्वपूर्ण कानून बना रखे थे। जब कोई किसान और जमींदार उनकी शर्तो को पूरा नहीं कर पता था तब वह उसकी जमीन और संपत्ति पर अपना कब्जा कर लेते थे। इस कारण किसान और जमींदार दोनों के मन में व्यापक आक्रोश उत्पन्न हुआ।

1857 की क्रांति के आर्थिक कारण

  • भारतीय कारीगरों से उनकी रोजी-रोटी छिनना- इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के कारण मशीनों से बने उत्पाद अत्यंत सस्ते दामो में भारत में बिकने लगे थे जिस कारण भारतीय कारीगरों के रोजगार के साधन छीनने लगे थे और ऊपर से ब्रिटिश सरकार ने उनके ऊपर अधिक कर भी लगा रखा था जिस कारण उन कारीगरों के मन मे असंतोष की भावना ने जन्म लेना शुरू कर दिया था।
  • अंग्रेज़ो की व्यापारिक नीति-अंग्रेज़ो की व्यापारिक नीति के कारण भारत के सभी भारतीयों के व्यापार ठप्प पड़ गए थे। भारतीय उत्पादो को विदेशों में भेजने के लिए अत्यधिक शुल्क देना पड़ता था, जिसमे मुनाफे के स्थान पर घाटा होने की संभावना अधिक होती थी और भारतीय उत्पादो को भारत में कोई खरीदने को तैयार नहीं था क्यूंकी इनकी कीमत इंग्लैंड के उत्पादो से अधिक होती थी जिस कारण भारतीय व्यापार लगभग समाप्त हो गया और भारतीय व्यापारियों के मन में गुस्सा बढ़ने लगा।
  • ब्रिटिश साम्राज्य की स्थायी बंदोबस्त की नीति और अत्यधिक कर-ब्रिटिश सरकार ने स्थायी बंदोबस्त की नीति के तहत भारत के जमींदारो को जमीन का मालिक बना दिया था। जिस जमींदार एक निश्चित मात्र में कर को सरकारी खजाने में जमा करा देते थे और किसानो से अधिक से अधिक मात्र में कर वसूल लेते थे। सामान्य जनता पर भी सरकार ने बहुत अधिक मात्रा में कर लगा रखा था, जिस कारण सामान्य जनता भी सरकार का विरोध करने लगी थी।

1857 की क्रांति के सामाजिक तथा धार्मिक कारण

  • 1856 का धार्मिक निर्योग्यता अधिनियम-ब्रिटिश सरकार ने 1856 में एक कानून बनाया जिसके तहत ईसाई धर्म ग्रहण करने वाले व्यक्तियों को ही अपने पैतृक संपत्ति का हकदार माना गया और उन्हें नौकरियों में पदोन्नति, शिक्षा संस्थानों में प्रवेश की सुविधा प्रदान की गई। इस कानून के कारण बड़े व्यापक स्तर पर पादरियों ने हिन्दू और मुस्लिम को ईसाई बनाया जिस कारण भारतीय धार्मिक समाज अंग्रेज़ो पर क्रोधित होने लगा।
  • भारतीय समाज में सुधार कार्य-ब्रिटिश साम्राज्य ने उस समय भारतीय समाज की कुछ कुरीतियों को देखा और उन्हे सही करने का फैसला किया, जैसे वर्ष 1829 में लॉर्ड विलियम बैंटिक ने राजा राम मोहन राय की सहायता से सती प्रथा को समाप्त कर दिया था और बाल विवाह पर रोक लगा दी थी। इससे भारतीय हिंदुओं ने इसे अपने धर्म के विरुद्ध समझा और ब्रिटिश सरकार का विरोध करना शुरू कर दिया।
  • अंग्रेजी शिक्षा-अंग्रेज़ो ने भारतीय समाज को शिक्षित करने के लिए अंग्रेजी स्कूलों की शुरूआत की थी, जिसमें उन्होने भारतीयो को शिक्षा प्रदान करना शुरू किया इससे भारत के सभी धर्मो के लोगो को यह लगने लगा था की वह भारतीयो को अवश्य ईसाई बनाना चाहते है इसलिए उन्होने ने अंग्रेजी स्कूलों की शुरूआत की।
  • ईसाई प्रचारकों द्वारा अन्य धर्मों की निंदा-ईसाई प्रचारको ने भारत में अपने धर्म को सर्वश्रेष्ट बताने के लिए अन्य धर्मो के ग्रंथो और सिद्धांतों को गलत बताना शुरू कर दिया जिस कारण भारत में अंग्रेज़ो के खिलाफ बड़े व्यापक स्तर पर गुस्सा बढ़ने लगा था।

1857 की क्रांति के सैनिक कारण

  • भारतीय सैनिकों को समुद्र पर लड़ने के लिए भेजना- वर्ष 1856 में एक ऐसा कानून पास किया गया जिसके अनुसार लड़ने के लिए समुद्र पार भेजा जा सकता था, परंतु हिन्दू सैनिक समुद्र पार जाना अपने धर्म के खिलाफ समझते थे।
  • भारतीय सैनिकों के साथ अभद्र व्यवहार- ब्रिटिश सैनिक परेड के दौरान भारतीय सैनिकों के साथ अभद्र व्यवहार करते थे। वे भारतीयो के सामने ही उनकी सभ्यता, संस्कृति और धर्म का मजाक उड़ाते थे, जिस कारण भारतीय सैनिकों का आक्रोश अंग्रेजी सरकार के खिलाफ बढ़ने लगा था।
  • वेतन, पदोन्नति और तैनाती में भारतीयो के साथ भेदभाव- भारतीय सैनिकों के साथ ब्रिटिश प्रशासन भेदभाव वाली नीति अपनाता था, वे केवल ब्रिटिश सैनिकों और अधिकारियों के ही वेतन और पद में उन्नति करते थे। वह भारतियों की तैनाती भी अशांत इलाको में करते थे जबकि ब्रिटिश सैनिकों की तैनाती शांत व साफ इलाको में करते थे।

1857 की क्रांति के तात्कालिक कारण

  • चर्बी वाले कारतूस- 1857 की क्रांति का तात्कालिक कारण सैनिकों को दिये गये नए चर्बी वाले कारतूस थे। इन नए करतूसों पर सूअर और गाय की चर्बी लगी होती थी, जिसे मुंह से फाड़कर ही बन्दको में डाला जाता था। ब्रिटिश सेना में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही सम्मिलित थे और उन्होने इसे अपने धर्म के खिलाफ मान कर उपयोग करने से माना कर दिया था परंतु ब्रिटिश सरकार ने उनकी बातों को नहीं माना।
  • सबसे पहले इन चर्बी वाले कारतूसों का उपयोग करने का विरोध बैरकपुर छावनी के सैनिक ने किया था। इन करतूसों की सच्चाई जानकार मंगल पांडे ने गुस्से में आ कर एक ब्रिटिश अधिकारी की हत्या भी कर दी थी।

1857 की क्रांति का प्रसार

  • दिल्ली पर कब्जा करने के बाद शीघ्र ही है विद्रोह मध्य एवं उत्तरी भारत मेँ फैल गया।
  • 4 जून को लखनऊ मेँ बेगम हजरत हजामत महल के नेतृत्व मेँ विद्रोह का आरंभ हुआ जिसमें हेनरी लॉटेंस की हत्या कर दी गई।
  • 5 जून को नाना साहब के नेतृत्व मेँ कानपुर पर अधिकार कर लिया गया नाना साहब को पेशवा घोषित किया गया।
  • झांसी मेँ विद्रोह का नेतृत्व रानी लक्ष्मी बाई ने किया।
  • झांसी के पतन के बाद लक्ष्मी बाई ने ग्वालियर मेँ तात्या टोपे के साथ मिलकर विद्रोह का नेतृत्व किया। अंततः लक्ष्मीबाई अंग्रेजोँ जनरल ह्यूरोज से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुई।
  • रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु पर जनरल ह्यूरोज ने कहा था, “भारतीय क्रांतिकारियोँ मेँ यहाँ सोयी हुई औरत मर्द है।“
  • तात्या टोपे का वास्तविक नाम रामचंद्र पांडुरंग था। वे ग्वालियर के पतन के बाद नेपाल चले गए जहाँ एक जमींदार मानसिंह के विश्वासघात के कारण पकडे गए और 18 अप्रैल 1859 को उन्हें फाँसी पर लटका दिया गया।
  • बिहार के जगरीपुर मेँ वहाँ के जमींदार कुंवर सिंह 1857 के विद्रोह का झण्डा बुलंद किया।
  • मौलवी अहमदुल्लाह ने फैजाबाद में 1857 के विद्रोह का नेतृत्व प्रदान किया।
  • अंग्रेजो ने अहमदुल्ला की गतिविधियो से चिंतित होकर उसे पकड़ने के लिए 50 हजार रुपए का इनाम घोषित किया था।
  • खान बहादुर खान ने रुहेलखंड मेँ 1857 के विद्रोह को नेतृत्व प्रदान किया था, जिसे पकड़कर फांसी दे दी गई।
  • राज कुमार सुरेंद्र शाही और उज्जवल शाही ने उड़ीसा के संबलपुर मेँ विद्रोह का नेतृत्व किया।
  • मनीराम दत्त ने असम मेँ विद्रोह का नेतृत्व किया।
  • बंगाल, पंजाब और दक्षिण भारत के अधिकांश हिस्सों ने विद्रोह मेँ भाग नहीँ लिया।
  • अंग्रेजो ने एक लंबे तथा भयानक युद्ध के बाद सितंबर, 1857 मेँ दिल्ली पर पुनः अधिकार कर लिया।

1857 की क्रांति के प्रमुख नेता व नायक

नेता का नाम क्रांति की तिथि केंद्र
बहादुर शाह जफ़र, बख़्त खान 11 मई, 1857 दिल्ली

बहादुर शाह जफ़र: बहादुर शाह जफर भारत में मुगल साम्राज्य के अंतिम सम्राट थे, जिन्होंने दिल्ली में 1857 की क्रांति में सिपाहियों का नेतृत्व किया था। लेकिन इस युद्ध में दिल्ली के क्रांतिवीरों की हार हुई, जिसके बाद बहादुर शाह ज़फर को अंग्रेजों ने ब्रिटिश भारत के बर्मा प्रांत की रंगून जेल में भेज दिया जहाँ कैद में रहते हुए 7 नवंबर 1862 को उनकी मृत्यु हो गई।

बख़्त खान: बख़्त खान दिल्ली में चल रहे 1857 की क्रांति में भारतीय सैनिकों के कमांडर-इन-चीफ थे। खान पहले ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी में सुबेदार के पद पर तैनात थे लेकिन एनाफील्ड रायफल के कारतूस की खोल पर सूअर और गाय की चर्बी लगी होने के कारण वे अंग्रेजों के खिलाफ हो गए और 1 जुलाई 1857 दिल्ली अकार अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए थे।

नाना साहेब, तांत्या टोपे 5 जून, 1857 कानपुर

नाना साहेब: नाना साहेब जिनका असली नाम 'धोंडूपन्त' था जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में कानपुर से भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व किया था। नाना साहेब और अंग्रेजों के बीच कई विवाद हूएं जिसमें पहला मुख्य कारण 1 जनवरी 1851 को उनके पिता पेशवा बाजीराव द्वितीय का देहांत बाद नाना साहेब द्वारा पेशवा की उपाधि को न मानना दूसरा मुख्य कारण अंग्रेजों से पेशवाई पेंशन के चालू कराने की मांग को भी इनकार देना जैसे कारण शामिल थे।

5 जून 1857 को कानपुर की एक ब्रिटिश पत्रिका से ईस्ट इंडिया कंपनी के खजाने पर कब्जा करने के बाद उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ 1857 की क्रांति में भाग लेने की घोषणा की थी।

तांत्या टोपे: तात्या टोपे को कानपुर में चल रही 1857 की क्रांति में नाना साहब ने अपना सैनिक सलाहकार नियुक्त किया था। ब्रिगेडियर जनरल हैवलॉक ने सेना के साथ इलाहाबाद की ओर से कानपुर पर हमला किया तब तात्या टोपे ने कानपुर की सुरक्षा में अपना जी-जान लगा दिया, लेकिन16 जुलाई 1857 को उनकी पराजय हो गयी और उन्हें कानपुर छोडना पड़ा। इसके बाद भी वे झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, राव साहब, बहादुरशाह जफर आदि के विदा हो जाने के बाद भी करीब एक साल तक भारतीय क्रांतिकारियों की कमान संभाले रहे।

बेगम हजरत महल, बिरजिस क़द्र 4 जून, 1857 लखनऊ
बेगम हज़रत महल: बेगम हज़रत महल अवध (वर्तमान उत्तर प्रदेश में) के नवाब वाजिद अली शाह की दूसरी पत्नी थीं। जब नवाब वाजिद अली शाह को अंग्रेजों ने उन्हें अपने ही राज्य से निकाल दिया तब बेगम हज़रत ने अवध रियासत के राजकीय मामलों को संभाला।

1857 से 1858 के दौरान राजा जयलाल सिंह की अगुवाई में बेगम हज़रत महल के सेनिकों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी और लखनऊ पर फिर से अपना अधिकार स्तापित कर लिया था। अपने नाबालिग पुत्र बिरजिस क़द्र को गद्दी पर बिठाकर उन्होंने अंग्रेज़ी सेना का स्वयं मुक़ाबला किया। उनका देहांत 60 वर्ष की आयु में काठमांडू, नेपाल में 7 अप्रैल 1879 को हुआ था।

बिरजिस क़द्र: बिरजिस क़द्र अवध के अवध के 6वें राजा और बेगम हजरत महल के पुत्र थे। जहां 1857 में पूरे देश आजादी की क्रांति का बोलबाला था, वहीं दूसरी तरफ अंग्रेजी हुकूमत एक के बाद एक क्रांतिवीरों को मौत के घाट उतार रही थी। तब बिरजिस क़द्र अपनी माँ के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ रहे थे।

रानी लक्ष्मीबाई 4 जून 1857 झाँसी
रानी लक्ष्मीबाई: रानी लक्ष्मीबाई मराठा द्वारा शासित वर्तमान उत्तर प्रदेश के झाँसी राज्य की रानी हुआ करती थीं। उन्होंने सिर्फ 29 वर्ष की उम्र में 1857 की क्रांति में अंग्रेज साम्राज्य की सेना से युद्ध किया परंतु आजादी की इस लड़ाई में वीरगति को प्राप्त हुईं। 18 जून 1858 को ग्वालियर के निकट कोटा की सराय में ब्रितानी सेना से लड़ते-लड़ते रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु हुई थी।
वीर कुंवर सिंह, अमर सिंह 12 जून, 1857 जगदीशपुर

वीर कुंवर सिंह: वीर कुंवर सिंह ने 1857 के संग्राम में अपने सेनापति मैकु सिंह एवं भारतीय सैनिकों का नेतृत्व किया था। वीर कुंवर सिंह ने 25 जुलाई 1857 को दानापुर में विद्रोह करने वाले सैनिकों की कमान संभाली थी। दो दिन बाद उन्होंने जिला मुख्यालय आरा पर कब्जा किया। लेकिन मेजर विंसेंट आइरे ने 3 अगस्त 1857 को शहर को राहत दी, सिंह की सेना को हराया और जगदीशपुर को नष्ट कर दिया था।

बाबू अमर सिंह: बाबू अमर सिंह, सन 1857 के भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख योद्धा एवं क्रान्तिकारी थे। वे बाबू कुंवर सिंह के भाई थे। बाबू अमर सिंह ने मूल रूप से आरा की कुख्यात घेराबंदी सहित अपने भाई के अभियान में सहायता की थी। 26 अप्रैल 1858 को बाबू कुंवर सिंह की मृत्यु के बाद, बाबू अमर सिंह सेना के प्रमुख बने और भारी बाधाओं के बावजूद संघर्ष जारी रखा और काफी समय तक शाहाबाद जिले में समानांतर सरकार चलाई थी।

मौलवी अहमदुल्लाह जून, 1857 फैजाबाद

अहमदुल्लाह शाह: अहमदुल्लाह शाह फैज़ाबाद के मौलवी थे, जिन्हें लोग 1857 के विद्रोह के लाइट हाउस के रूप में जानते थे। उन्होंने 1857 के विद्रोह में, नाना साहिब और खान बहादुर खान के साथ मिलकर आजादी की लड़ाइयाँ लड़ी थीं।

वे 1857 और 1858 के भारतीय विद्रोह पूर्ण रूप से सक्रिय रहे। उन्होंने अवध की क्रांतिकारी सेना का नेतृत्व कर बरकत अहमद के साथ मिलकर हेनरी मोंटगोमेरी लॉरेंस की अंग्रेजी सेना के खिलाफ लड़ाई जीती थी। उनकी मृत्यु विश्वासघाती ढंग से एक टॉप शॉट गोली मारकर की गई थी।

मौलवी लियाक़त अली जून, 1857 इलाहबाद

मौलवी लियाक़त अली: मौलवी लियाकत अली अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम 1857 के विद्रोह करने वाले नेताओं में से एक थे। वे प्रयागराज के परगना चैल में ग्राम महगाँव के थे। चैल के लोगों ने भी लियाकत अली गोला-बारूद के साथ समर्थन किया।

उन्होंने खुसरो बाग पर कब्जा कर उसे मुख्यालय बना लिया। लेकिन खुसरो बाग को दो सप्ताह में अंग्रेजों ने वापस ले लिया था। मौलवी को 14 साल बाद सितंबर 1871 में मुंबई के बायकुला रेलवे स्टेशन से पकड़कर उन्हें आजीवन कारावास सजा का फरमान सुनाया गया, जिसके लिए उन्हें रंगून जेल (वर्तमान यांगून) भेजा गया और कैद में रहते हुए 17 मई 1892 को उनकी मृत्यु हो गई।

खान बहादुर खान रुहेला जून, 1857 बरेली
खान बहादुर खान: खान बहादुर खान रुहेला रुहेलखण्ड के द्वितीय नवाब, हाफिज रहमत खान के पोते थे। उन्होंने 1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजों का विरोध किया, और बरेली में विद्रोह की सफलता के बाद अपनी सरकार बनाई। जब 1857 का भारतीय विद्रोह विफल हुआ, तो बरेली भी अंग्रेजों के अधीन हो गया। वे वहाँ से बचकर नेपाल चले गए, लेकिन वहाँ के लोगों ने उन्हें पकड़कर अंग्रेजों को सौंप दिया। अंग्रेजों ने उन्हें 24 फरवरी 1860 को फांसी की सजा दी थी।

1857 के विद्रोह के परिणाम

1857 के विद्रोह के परिणामों की विवेचना नीचे की गई है:

  • 1857 की विद्रोह के बाद 2 अगस्त, 1858 को ब्रिटिश संसद ने एक अधिनियम पारित करके, भारत मे कंपनी शासन का अंत कर दिया गया तथा भारत का शासन ब्रिटिश क्राउन के अधीन कर दिया गया।
  • भारत के गवर्नर जनरल को अब वायसराय कहा जाने लगा।
  • बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स और बोर्ड ऑफ़ कण्ट्रोल खत्म करके भारत सचिव के साथ 15 सदस्यीय भारतीय परिषद की स्थापना की गई।
  • 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा सेना के पुनर्गठन के लिए स्थापति पील आयोग की रिपोर्ट पर सेना मेँ भारतीय सैनिकों की तुलना मेँ यूरोपियो का अनुपात बढ़ा दिया गया।
  • भारतीय रजवाड़ों के प्रति विजय और विलय की नीति का परित्याग कर सरकार ने राजाओं को गोद लेने की अनुमति प्रदान की।

1857 के विद्रोह से सम्बंधित महत्वपूर्ण स्मरणीय तथ्य

  • बहादुर शाह दिल्ली मेँ प्रतीकात्मक नेता था। वास्तविक नेतृत्व सैनिकों की एक परिषद के हाथों मेँ था, जिसका प्रधान बख़्त खान था।
  • 1857 के विद्रोह के समय भारत का गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग था।
  • यह विद्रोह सत्ता पर अधिकार के बाद लागू किए जाने वाले किसी सामाजिक विकल्प से रहित था।
  • 1857 के विद्रोह मेँ पंजाब, राजपूताना, हैदराबाद और मद्रास के शासकों ने बिल्कुल हिस्सा नहीँ लिया।
  • विद्रोह की असफलता के कई कारण थे, जिसमेँ प्रमुख कारण था एकता, संगठन और साधनों की कमी।
  • बंगाल के जमींदारों ने विद्रोहियोँ को कुचलने के लिए अंग्रेजो की मदद की थी।
  • बी. डी. सावरकर ने अपनी पुस्तक भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के माध्यम से इस धारणा को जन्म दिया कि, 1857 का विद्रोह एक सुनियोजित राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम था।
  • वास्तव मेँ 1857 का विद्रोह मात्र सैनिक विद्रोह नहीँ था, बल्कि इसमेँ समाज का प्रत्येक वर्ग शामिल था। विद्रोह मेँ लगभग डेढ़ लाख लोगोँ की जानेँ गई।

अब संबंधित प्रश्नों का अभ्यास करें और देखें कि आपने क्या सीखा?

1857 की क्रांति से संबंधित प्रश्न उत्तर 🔗

यह भी पढ़ें:

1857 की क्रांति प्रश्नोत्तर (FAQs):

1857 के विद्रोह के नेता नाना साहेब का नाम धोंडू पंत था, जो भारतीय स्वतंत्रता के प्रथम युद्ध के सूत्रधार थे। स्वतंत्रता संग्राम में नाना साहब ने कानपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध नेतृत्व किया।

मंगल पाण्डे ने 1857 की क्रांति के समय मारो फिरंगी का नारा दिया था। यह नारा ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोही सेनानियों और भारतीय स्वतंत्रता के अग्रदूतों द्वारा उठाया गया था। इस नारे ने विद्रोही सेनानियों के जोश और उत्साह को बढ़ाया और भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

विद्रोह को कई नामों से जाना जाता है: सिपाही विद्रोह (ब्रिटिश इतिहासकारों द्वारा), भारतीय विद्रोह, महान विद्रोह (भारतीय इतिहासकारों द्वारा), 1857 का विद्रोह, भारतीय विद्रोह और स्वतंत्रता का पहला युद्ध विनायक दामोदर सावरकर द्वारा हुआ था।

लखनऊ में 1857 के विद्रोह का नेतृत्व बेगम हजरत महल ने किया था। बेगम हज़रत महल अवध के नवाब वाजिद अली शाह की दूसरी पत्नी थीं।

1857 के विद्रोह के समय लॉर्ड कनिंग भारत के गवर्नर-जनरल थे। वह ब्रिटिश भारत के प्रशासनिक शासक थे और उनका कार्यकाल पीईसी में चला गया। विद्रोह के दौरान, वह ब्रिटिश सरकार की ओर से भारत में शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखने का नेतृत्व कर रहे थे।

  Last update :  Wed 29 Mar 2023
  Download :  PDF
  Post Views :  28021