वराह लक्ष्मी नरसिम्हा मंदिर संक्षिप्त जानकारी

स्थानसिंहाचलम, विशाखापत्तनम जिला, आंध्रप्रदेश राज्य, (भारत)
निर्माण1238 ई॰ से 1264 ई॰ (वर्थमान स्थिति)
निर्माताप्रथम नरसिंह देव
प्रकारऐतिहासिक हिन्दू मंदिर
समर्पितवराह लक्ष्मी नरसिम्हा मंदिर
देवताविष्णु एवं लक्ष्मी
वास्तुकलाकलिंग आर्किटेक्चर, एवं द्रविड़ वास्तुकला

वराह लक्ष्मी नरसिम्हा मंदिर का संक्षिप्त विवरण

वराह लक्ष्मी नरसिम्हा मंदिर भारत के आंध्रप्रदेश राज्य के सबसे बड़े शहर विशाखापत्तनम में सिंहाचलम की पहाड़ी पर स्थित है। यह मंदिर समुद्र तट से 800 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। जिसके साथ ही उत्तरी विशाखापट्‍टनम से मंदिर 16 किमी की दूर पर है। यह एक हिन्दू मंदिर है। जो हिंदू त्रिमूर्ति देवताओं में से एक भगवान विष्णु को समर्पित है, जिन्हें वराह नरसिम्हा के रूप में पुजा जाता है। वराह लक्ष्मी नरसिम्हा मंदिर आंध्र प्रदेश के 32 नरसिम्हा मंदिरों में से एक है जो महत्वपूर्ण तीर्थस्थल हैं।

वराह लक्ष्मी नरसिम्हा मंदिर का इतिहास

वराह लक्ष्मी नरसिम्हा मंदिर का इतिहास भगवान विष्णु की एक कथा के साथ जुड़ा हुआ है। यह मंदिर सिंहाचल में स्थित है जिसका शाब्दिक अर्थ है, सिंह या पर्वत इसलिए यह मंदिर एक पहाड़ी पर बना हुआ है।

ऐसा माना जाता है की यह पर्वत भगवान विष्णु के चौथे अवतार प्रभु नृसिंह का निवास स्थान हुआ करता था और इसी स्थान पर भगवान नृसिंह अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा के लिए अवतरित हुए थे। स्थल पुराण के अनुसार भगवान विष्णु के भक्त प्रहलाद ने ही इस स्थान पर नृसिंह भगवान का पहला मंदिर बनवाया था। भक्त प्रहलाद द्वारा इस मंदिर का निर्माण भगवान विष्णु के अवतार नृसिंह द्वारा उनके पिता के संहार के बाद बनवाया था।

परन्तु उनकी मृत्यु के पश्चात इस मंदिर का रखरखाव नहीं हो सका और यह मंदिर पृथ्वी के अंदर समा गया। नियत समय के बाद लुनार वंश के पुरुरवा ने एक बार फिर इस मंदिर की खोज की और इसका पुनर्निर्माण करवाया। परंतु मंदिर के इतिहासकारों के अनुसार चालुक्य चोल राजा कुलोत्तुंग प्रथम द्वारा 9वीं शताब्दी ईस्वी का एक शिलालेख मिला है।

जिसके बाद 13वीं शताब्दी में मंदिर का कई बार पुनः निर्माण होता रहा है और बाद में मंदिर को कई शाही परिवारों से संरक्षण भी प्राप्त हुआ, जिनमें से विजयनगर साम्राज्य के तुलुव वंश उल्लेखनीय है।

मंदिर को 1564 ई॰ से 1604 ई॰ तक 40 वर्षों की धार्मिक उदासीनता का सामना करना पड़ा। इसके बाद 1949 ई॰ में, मंदिर राज्य सरकार के दायरे में आया और वर्तमान में सिंहचलम देवस्थानम बोर्ड द्वारा संरक्षित है।

वराह लक्ष्मी नरसिम्हा मंदिर के रोचक तथ्य

  1. अक्षय तृतीया के पवित्र दिन श्री लक्ष्मीनृसिंह भगवान का चन्दन से श्रृंगार किया जाता है, पौराणिक ग्रंथों के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन शुभ कार्य किये जाते हैं, और माना है की भगवान की प्रतिमा का वास्तविक रूप केवल इसी दिन देखा जा सकता है।
  2. श्री वाराह लक्ष्मी नरसिंह मन्दिर सिंहाचल क्षेत्र में ग्यारहवीं शताब्दी में बने विश्व के गिने-चुने प्राचीन मंदिरों में से एक माना जाता है।
  3. मंदिर के अंदर तीन आंगन और अंदर जाने के लिए पाँच द्वार हैं। जिससे मंदिर को बाहर से देखने पर एक किले जैसा प्रतीत होता है।
  4. मंदिर की वास्तुकला कलिंग आर्किटेक्चर, चालुक्य वास्तुकला और चोल की शैलियों का मिश्रण है।
  5. मंदिर का मुख पश्चिम की ओर है, जो पुरुषोत्तम संहिता और विष्णु संहिता के अनुसार विजय के प्रतीक को दर्शाता है, इसके अलावा मंदिर में कई उप मंदिर और कुछ मंडप बने हुए हैं
  6. पुरातत्व विशेषज्ञों ने मंदिर परिसर में लगभग 500 शिलालेखों की खोज की है जिनमें से कुछ राजाओं, उनके अधिकारियों और नागरिकों के योगदान द्वारा बनाए गए थे। परंतु अधिकांश शिलालेख द्विभाषी हैं और वे संस्कृत और तेलगु भाषा में लिखे गए हैं परंतु ज़्यादातर संस्कृत में हैं।
  7. विजयनगरम रियासत के पुसापति गजपति परिवार के सदस्य वराह लक्ष्मी नरसिम्हा मंदिर के वर्तमान वंशानुगत न्यासी हैं और पिछली तीन शताब्दियों से मंदिर की सेवा कर रहे हैं।
  8. मंदिर के अंदर दीवारों पर भगवान विष्णु, उनकी पत्नी लक्ष्मी और अज्वार के चित्र बने हुए हैं और प्रवेश द्वार पर हिन्दू संत के पैरों के निशान बने हुए हैं।
  9. मंदिर का गर्भगृह घन-आकार का है जिसकी दीवारों में चालुक्य शैली में नक्काशी की गई मूर्तियां स्थापित हैं, एवं कोणार्क मंदिर के समान मूर्तियों पर, इंद्र और गजलक्ष्मी के चित्र बने हुए हैं। मंदिर के गर्भगृह की दक्षिणी दीवार पर, प्रह्लाद की उपस्थिति में हिरण्यकश्यप को मारते नरसिम्हा की एक मूर्ति बनी हुई है। जो मंदिर की वास्तुकला की एक अनूठी विशेषता तथा एक स्थायी मुद्रा का स्वरूप है।
  10. मंदिर के अंदर दो मंडप बने हुए हैं जिनके चारों ओर बाहरी जगत् शक्ति को दर्शाते हुए गढ़े हुए हाथियों की एक पंक्ति है और मंदिर के मुख्य हॉल में कप्पम स्तम्भम नाम का एक स्तंभ है, जिसके बारे में माना जाता है कि इसमें उपचारात्मक शक्तियाँ हैं। इसके अलावा मंदिर के गर्भगृह में चारों ओर भीतर हंसों की एक पंक्ति बनी हुई है।
  11. प्रमुख मंदिर के परिसर में केवल चार मुख्य आभूषणों का उपयोग किया गया है, जिसमें हीरे और माणिक से बना एक थिरुनामम, पन्ना की एक श्रृंखला, एक 100 तोला सोने का कंगन और एक स्वर्ण मुकुट सम्मिलित है।
  12. वराह लक्ष्मी नरसिम्हा मंदिर में कई महत्वपूर्ण त्यौहार मनाए जाते हैं, जिनमे कल्याणोत्सव, नरसिंह जयंती, चंदनोत्सव, कामदाना, महत्वपूर्ण त्यौहार हैं। कल्याणोत्सव भारतीय चंद्र चैत्र महीने की पहली तिमाही के 11 वें दिन मनाया जाता है। चंदनोत्सव जिसे चंदन यात्रा के नाम से भी जाना जाता है, यह अक्षय तृतीया (अप्रैल - मई) के त्यौहार के दिन मनाया जाता है। नरसिंह जयंती वैशाख महीने की पहली छमाही (वैसाख सुदं चतुर्दशी) को मनाई जाती है और भारतीय हिन्दी फाल्गुन माह में पूर्णिमा के दिन कामदाना का त्यौहार मनाया जाता है।

  Last update :  Wed 3 Aug 2022
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