मानव शरीर के रोग और प्रभावित अंग

✅ Published on September 11th, 2020 in भारतीय रेलवे, विज्ञान, सामान्य ज्ञान अध्ययन

मानव शरीर के प्रमुख रोग एवं प्रभावित अंग: (List of Major Human Diseases and Affected Body Parts in Hindi)

शरीर के किसी अंग/उपांग की संरचना का बदल जाना या उसके कार्य करने की क्षमता में कमी आना ‘रोग’ कहलाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो शरीर के अलग–अलग हिस्सों का सही से काम नहीं करना। अनुवांशिक विकार, हार्मोन का असंतुलन, शरीर की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली का सही तरीके से काम नहीं करना, कुछ ऐसे कारक हैं जो मनुष्य के स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। एसएससी , यूपीएससी एवं अन्य सभी प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर ही मानव रोगों से सवाल पूछे जाते है, यदि आप देखें तो शायद ही ऐसा कोई प्रश्नपत्र पायें जिसमें मानव रोगों से सवाल ना आया हो, एसएससी में तो हमेशा ही 1 से 2 सवाल मानव रोगों के बारे मे आता ही है, इसी को ध्यान में रखकर यहाँ मानव शरीर के प्रमुख रोग एवं उससे प्रभावित अंगो पर आधारित सामान्य ज्ञान जानकारी प्राप्त करा रहे हैं। आइये जानते है मानव शरीर के प्रमुख रोग एवं उससे प्रभावित अंगो के बारे में:

मानव शरीर के प्रमुख रोग एवं उससे प्रभावित अंगो की सूची:

रोग का नाम प्रभावित अंग का नाम
गठिया या रयुमैटिज्म जोड़ों
गठिया रोग एक दीर्घकालिक अवस्था है जिसके होने से जोड़ों में दर्द, सूजन और अकड़न आने लगती है। लक्षण आम तौर पर हाथ, पैर और कलाई को प्रभावित करते हैं। कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है जहाँ लक्षण बद से बदतर हो जाएँ, जिसे फ्लयेर-अप्स या फ्लेयर्स के नाम से जाना जाता है। यूँ तो फ्लेयर्स का अनुमान लगाना मुश्किल होता है, लेकिन उपचार की सहायता से इन फ्लेयर्स की संख्या और फ्लेयर्स से हो रहे जोड़ों के नुकसान को लम्बे समय तक के लिये कम किया जा सकता है।
अस्थमा ब्रोन्कियल स्नायु
किसी व्यक्ति के Lung तक हवा तक न पहुंच पाने के कारण उसे सांस लेने में होने वाली तकलीफ को अस्थमा कहा जाता है। अस्थमा की वजह से उसे कई समस्याएं जैसे सांस लेने, जोर-जोर से सांस लेना, खांसी होना, सांस का फूलना इत्यादि होती हैं। आमतौर पर,अस्थमा के लक्षणों में सांस का फूलना, सीने में दर्द होना, खांसी होना इत्यादि शामिल हैं। इन सभी लक्षणों में उतार-चढ़ाव हो सकते हैं और कुछ मामलों में अस्थमा से पीड़ित लोगों को यह पता ही नहीं चलता है कि उन्हें अस्थमा की बीमारी है क्योंकि उनमें ये लक्षण नज़र नहीं आते हैं।
मोतियाबिंद आंखें
मोतियाबिंद जिसे हम सफेद मोतिया भी कहते हैं, जिसमे आंख के प्राकृतिक पारदर्शी लेंस का धुंधलापन हो जाता है। यह 40 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में दृष्टि हानि का सबसे आम कारण है और दुनिया में आँख की दृष्टि खो देना अथवा दृष्टिविहीनता का प्रमुख कारण भी है। प्रारंभ में, मोतियाबिंद का आपकी दृष्टि पर बहुत कम प्रभाव डालता है । आपको महसूस होते रहता हैं कि आपकी दृष्टि थोड़ी-थोड़ी करके धुंधली होती जा रही है, जैसे धुंधले  कांच के  टुकड़े या एक इंप्रेशनिस्ट पेंटिंग को देखने से होता है।
मधुमेह अग्नाशय,गुर्दे, आँखें
डायबिटीज मेलेटस (डीएम), जिसे सामान्यतः मधुमेह कहा जाता है, चयापचय संबंधी बीमारियों का एक समूह है जिसमें लंबे समय तक रक्त में शर्करा का स्तर उच्च होता है। उच्च रक्त शर्करा के लक्षणों में अक्सर पेशाब आना होता है, प्यास की बढ़ोतरी होती है, और भूख में वृद्धि होती है।  यदि अनुपचारित छोड़ दिया जाता है, मधुमेह कई जटिलताओं का कारण बन सकता है।  तीव्र जटिलताओं में मधुमेह केटोएसिडोसिस, नॉनकेटोटिक हाइपरोस्मोलर कोमा, या मौत शामिल हो सकती है। गंभीर दीर्घकालिक जटिलताओं में हृदय रोग, स्ट्रोक, क्रोनिक किडनी की विफलता, पैर अल्सर और आंखों को नुकसान शामिल है।
डिप्थेरिया गला
रोहिणी या डिप्थीरिया (Diphtheria) उग्र संक्रामक रोग है, जो 2 से लेकर 10 वर्ष तक की आयु के बालकों को अधिक होता है, यद्यपि सभी आयुवालों को यह रोग हो सकता है। इसका उद्भव काल (incubation period) दो से लेकर चार दिन तक का है। रोग प्राय: गले में होता है और टॉन्सिल भी आक्रांत होते हैं। स्वरयंत्र, नासिका, नेत्र तथा बाह्य जननेंद्रिय भी आक्रांत हो सकती हैं। यह वास्तव में स्थानिक रोग है, किंतु जीवाणु द्वारा उत्पन्न हुए जीवविष के शरीर में व्याप्त होने से रुधिर विषाक्तता (Toxemia) के लक्षण प्रकट हो जाते हैं। ज्वर, अरुचि, सिर तथा शरीर में पीड़ा आदि जीवविष के ही परिणाम होते हैं। इनका विशेष हानिकारक प्रभाव हृदय पर पड़ता है। कुछ रोगियों में इनके कारण हृदयविराम (heart failure) से मृत्यु हो जाती है।
कुष्ठ, एक्जिमा, दाद त्वचा, तंत्रिकाएं
दाद या दद्रु कुछ विशेष जाति का फफूँदों के कारण उत्पन्न त्वचाप्रदाह है। ये फफूंदें माइक्रोस्पोरोन (Microsporon), ट्राकॉफाइटॉन (Trichophyton), एपिडर्मोफाइटॉन (Epidermophyton) या टीनिया जाति की होती है। दद्रु रोग कई रूपों में शरीर के अंगों पर आक्रमण करता है। एक्जिमा होने की स्थिति में, त्वचा पर लाल पैच, सूजन, खुजली, त्वचा फटी और खुरदरे हो जाती हैं. कुछ लोगों में फफोले विकसित होते हैं।
ग्लूकोमा, ट्रेकोमा, रतौंधी, मोतियाबिंद, ट्रेकोमा, केटेरेक्ट आंखें
कांच बिंदु रोग, ग्लूकोमा या काला मोतिया नेत्र का रोग है। यह रोग तंत्र में गंभीर एवं निरंतर क्षति करते हुए धीरे-धीरे दृष्टि को समाप्त ही कर देता है। ट्रैकोमा संक्रमण पलकों के भीतरी सतह पर खुरदुरापन पैदा करता है। इस खुरदुरेपन की वजह से आँखों में दर्द, आँखों के बाहरी सतह या कॉर्निया (नेत्रगोलक का ऊपरी स्‍तर) का टूटना और संभवत: अंधता हो सकती है। रतौंधी, आंखों की एक बीमारी है। इस रोग के रोगी को दिन में तो अच्छी तरह दिखाई देता है, लेकिन रात के वक्त वह नजदीक की चीजें भी ठीक से नहीं देख पाता। मोतियाबिंद आंखों का एक सामान्य रोग है। प्रायः पचपन वर्ष की आयु से अधिक के लोगों में मोतियाबिंद होता है, किन्तु युवा लोग भी इससे प्रतिरक्षित नहीं हैं। मोतियाबिंद विश्व भर में अंधत्‍व के मुख्य कारण हैं। 60 से अधिक आयु वालों में 80 प्रतिशत लोगों में मोतियाबिंद विकसित होता है।
घेंघा थायराइड ग्रंथि
घेंघा (Goiter) एक रोग है जिसमे गला फूल जाता है। यह शरीर में आयोडीन के की कमी के कारण होता है। आयोडीन की कमी के कारण थायरायड ग्रन्थि में सूजन आ जाती है। यह रोग बहुधा उन क्षेत्रों के लोगों को होता है जहाँ पानी में आयोडीन नहीं होता। आयोडीन की कमी की पूर्ति के लिये प्राय: आयोडीनयुक्त नमक का उपयोग करने की सलाह दी जाती है।
पीलिया लिवर
रक्तरस में पित्तरंजक (Billrubin) नामक एक रंग होता है, जिसके आधिक्य से त्वचा और श्लेष्मिक कला में पीला रंग आ जाता है। इस दशा को कामला या पीलिया (Jaundice) कहते हैं। रक्त में लाल कणों का अधिक नष्ट होना तथा उसके परिणामस्वरूप अप्रत्यक्ष पित्तरंजक का अधिक बनना बच्चों में कामला, नवजात शिशु में रक्त-कोशिका-नाश तथा अन्य जन्मजात, अथवा अर्जित, रक्त-कोशिका-नाश-जनित रक्ताल्पता इत्यादि रोगों का कारण होता है।
ल्यूकेमिया रक्त
श्वेतरक्तता या ल्यूकीमिया (leukemia) रक्त या अस्थि मज्जा का कर्कट रोग है। इसकी विशेषता रक्त कोशिकाओं, सामान्य रूप से श्वेत रक्त कोशिकाओं (श्वेत कोशिकाओं), का असामान्य बहुजनन (प्रजनन द्वारा उत्पादन) है। श्वेतरक्तता एक व्यापक शब्द है जिसमें रोगों की एक विस्तृत श्रेणी शामिल है। अन्य रूप में, यह रुधिरविज्ञान संबंधी अर्बुद के नाम से ज्ञात रोगों के समूह का भी एक व्यापक हिस्सा है।
मलेरिया तिल्ली
मलेरिया या दुर्वात एक वाहक-जनित संक्रामक रोग है जो प्रोटोज़ोआ परजीवी द्वारा फैलता है। यह मुख्य रूप से अमेरिका, एशिया और अफ्रीका महाद्वीपों के उष्ण तथा उपोष्ण कटिबंधी क्षेत्रों में फैला हुआ है। मलेरिया के परजीवी का वाहक मादा एनोफ़िलेज़ (Anopheles) मच्छर है। इसके काटने पर मलेरिया के परजीवी लाल रक्त कोशिकाओं में प्रवेश कर के बहुगुणित होते हैं जिससे रक्तहीनता (एनीमिया) के लक्षण उभरते हैं (चक्कर आना, साँस फूलना, द्रुतनाड़ी इत्यादि)। इसके अलावा अविशिष्ट लक्षण जैसे कि बुखार, सर्दी, उबकाई और जुखाम जैसी अनुभूति भी देखे जाते हैं। गंभीर मामलों में मरीज मूर्च्छा में जा सकता है और मृत्यु भी हो सकती है।
मेनिनजाइटिस मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी
तानिकाशोथ या मस्तिष्कावरणशोथ या मेनिन्जाइटिस (Meningitis) मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु को ढंकने वाली सुरक्षात्मक झिल्लियों (मस्तिष्कावरण) में होने वाली सूजन होती है। यह सूजन वायरस, बैक्टीरिया तथा अन्य सूक्ष्मजीवों से संक्रमण के कारण हो सकती है साथ ही कम सामान्य मामलों में कुछ दवाइयों के द्वारा भी हो सकती है। इस सूजन के मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु के समीप होने के कारण मेनिन्जाइटिस जानलेवा हो सकती है
ओटिटिस कान
मध्यकर्णशोथ (लैटिन), कान के मध्य में होने वाली सूजन या मध्य कान के संक्रमण को कहते हैं। यह समस्या यूस्टेचियन ट्यूब नामक नलिका के साथ-साथ कर्णपटही झिल्ली और भीतरी कान के बीच के हिस्से में होती है। यह कान में होने वाली दो प्रकार की सूजनों में से एक है, जिसे आम भाषा में कान के दर्द के नाम से जाना जाता है।
पक्षाघात तंत्रिकाओं
पक्षाघात तब लगता है जब अचानक मस्तिष्क के किसी हिस्से मे रक्त आपूर्ति रुक जाती है या मस्तिष्क की कोई रक्त वाहिका फट जाती है और मस्तिष्क की कोशिकाओं के आस-पास की जगह में खून भर जाता है। जिस तरह किसी व्यक्ति के हृदय में जब रक्त आपूर्ति का आभाव होता तो कहा जाता है कि उसे दिल का दौरा पड़ गया है उसी तरह जब मस्तिष्क में रक्त प्रवाह कम हो जाता है या मस्तिष्क में अचानक रक्तस्राव होने लगता है तो कहा जाता है कि आदमी को “मस्तिष्क का दौरा’’ पड़ गया है।
निमोनिया,टी० बी० फेफड़ों
निमोनिया एक या दोनों फेफड़ों में एक गंभीर फेफड़ों का संक्रमण है जो बैक्टीरिया के कारण होता है। इससे सांस लेने में कठिनाई, बुखार, खांसी और थकान हो सकती है। हर साल, संयुक्त राज्य अमेरिका में निमोनिया के लगभग 3 मिलियन मामले होते हैं, और इनमें से 500,000 से अधिक मामले अस्पतालों में भर्ती होते हैं। यक्ष्मा, तपेदिक, क्षयरोग, एमटीबी या टीबी (tubercle bacillus का लघु रूप) एक आम और कई मामलों में घातक संक्रामक बीमारी है जो माइक्रोबैक्टीरिया, आमतौर पर माइकोबैक्टीरियम तपेदिक के विभिन्न प्रकारों की वजह से होती है क्षय रोग आम तौर पर फेफड़ों पर हमला करता है, लेकिन यह शरीर के अन्य भागों को भी प्रभावित कर सकता हैं। यह हवा के माध्यम से तब फैलता है.
पोलियो, ऐथलीट फुट पैर
बहुतृषा, जिसे अक्सर पोलियो या ‘पोलियोमेलाइटिस’ भी कहा जाता है एक विषाणु जनित भीषण संक्रामक रोग है जो आमतौर पर एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति मे संक्रमित विष्ठा या खाने के माध्यम से फैलता है। इसे ‘बालसंस्तंभ’ (Infantile Paralysis), ‘बालपक्षाघात’, बहुतृषा (Poliomyelitis) तथा ‘बहुतृषा एंसेफ़लाइटिस’ (Polioencephalitis) भी कहते हैं। यह एक उग्र स्वरूप का बच्चों में होनेवाला रोग है, जिसमें मेरुरज्जु (spinal cord) के अष्टश्रृंग (anterior horn) तथा उसके अंदर स्थित धूसर वस्तु में अपभ्रंशन (degenaration) हो जाता है और इसके कारण चालकपक्षाघात (motor paralysis) हो जाता है।
स्कर्वी, पायरिया दांतों और मसूड़ों
पायरिया मसूड़ों की बीमारी है जो एंट अमीबा जिंजिवेलिस नाम के कीटाणु से होती है। इसमें मुंह से दुर्गध तथा मसूड़ों से खून आने की शिकायत होती है। स्कर्वी विटामिन सी की कमी के कारण होने वाला एक रोग होता है। ये विटामिन मानव में कोलेजन के निर्माण के लिये आवश्यक होता है। इसमें शरीर खासकर जांघ और पैर में चकत्ते पड जाते हैं। रोग बढने पर मसूढ़े सूज जाते हैं और फ़िर दांत गिरने लगते हैं।
साइनसाइटिस साइनस अस्तर की सूजन
नाक के आसपास चेहरे की हड्डियों के भीतर नम हवा के रिक्त स्थान हैं, जिन्हें ‘वायुविवर’ या साइनस (sinus) कहते हैं। साइनस पर उसी श्लेष्मा झिल्ली की परत होती है, जैसी कि नाक और मुँह में। जब किसी व्यक्ति को जुकाम तथा एलर्जी हो, तो साइनस ऊतक अधिक श्लेष्म बनाते हैं एवं सूज जाते हैं। साइनस का निकासी तंत्र अवरुद्ध हो जाता है एवं श्लेष्म इस साइनस में फँस सकता है। बैक्टीरिया, कवक एवं वायरस वहाँ विकसित हो सकते हैं तथा वायुविवरशोथ[1] या साइनसाइटिस (Sinusitis) का कारण हो सकते हैं।
टॉन्सिल्लितिस टॉन्सिल्स
मनुष्य के तालु के दोनों ओर बादाम के आकार की दो ग्रंथियाँ होती है, जिन्हें हम गलगुटिका, तुंडिका या टॉन्सिल कहते हैं। इन ग्रंथियों के रोग को गलगुटिकाशोथ (तालुमूलप्रदाह Tonsilitis) कहते हैं। Tonsils के सूजन को Tonsillitis कहा जाता हैं। Tonsils यह गले के अंदर दोनों बाजु जीभ /Tongue के पिछले भाग से सटी हुई lymph nodes हैं। Tonsils हमारे शरीर में रोग प्रतिरोधक शक्ति यानि की Immunity का एक हिस्सा है जो की खतरनाक Bacteria और Virus को शरीर के भीतर प्रवेश करने से रोकता हैं।
टाइफाइड, हैजा, पेचिश आंतों
टाइफाइड का बुखार सैल्मोनेला टाइफी के द्वारा होने वाली एक जीवाणु जनित रोग है। विसूचिका या आम बोलचाल मे हैजा, जिसे एशियाई महामारी के रूप में भी जाना जाता है, एक संक्रामक आंत्रशोथ है जो वाइब्रियो कॉलेरी नामक जीवाणु के एंटेरोटॉक्सिन उतपन्न करने वाले उपभेदों के कारण होता है। पेचिश (Dysentery) या प्रवाहिका, पाचन तंत्र का रोग है जिसमें गम्भीर अतिसार (डायरिया) की शिकायत होती है और मल में रक्त एवं श्लेष्मा (mucus) आता है। यदि इसकी चिकित्सा नहीं की गयी तो यह जानलेवा भी हो सकता है।
रिकेट्स हड्डियाँ
सूखा रोग (रिकेट्स) हड्डियों का रोग है जो प्राय: बच्चों में होता है। बच्चों में हड्डियों की नरमाई या कमजोर होने को सूखा रोग कहते हैं। परिणामस्वरूप अस्थिविकार होकर पैरों का टेढ़ापन और मेरूदंड में असामान्य मोड आ जाते हैं। इसी प्रकार की विकृति को बड़ों में ऑस्टिमैल्सिया कहा जाता है।
टिटनेस, कोढ़, रैबीज, मिर्गी, पोलियो तंत्रिका तंत्र
रेबीज़ (अलर्क, जलांतक) एक विषाणु जनित बीमारी है जिस के कारण अत्यंत तेज इन्सेफेलाइटिस (मस्तिष्क का सूजन) इंसानों एवं अन्य गर्म रक्तयुक्त जानवरों में हो जाता है। प्रारंभिक लक्षणों में बुखार और एक्सपोजर के स्थल पर झुनझुनी शामिल हो सकते हैं। अपस्मार या मिर्गी एक तंत्रिकातंत्रीय विकार (न्यूरोलॉजिकल डिसॉर्डर) है जिसमें रोगी को बार-बार दौरे पड़ते है। मस्तिष्क में किसी गड़बड़ी के कारण बार-बार दौरे पड़ने की समस्या हो जाती है।
हेपेटाइटिस या पीलिया यकृत
हेपेटाइटिस के वायरस (Hepatitis Virus) 5 तरह के होते हैं- हेपेटाइटिस ए, बी, सी, डी और ई और इनकी वजह से लीवर ((Liver) में जलन और संक्रमण (Infection) हो जाता है. कई बार हेपेटाइटिस के चलते लीवर फाइब्रोसिस या लीवर कैंसर (Liver Cancer) की आशंका भी बढ़ जाती है. हेपेटाइटिस के वायरस कई बार पानी के जरिए भी फैलते हैं।
मेनिनजाइटिस मस्तिष्क
तानिकाशोथ या मस्तिष्कावरणशोथ या मेनिन्जाइटिस (Meningitis) मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु को ढंकने वाली सुरक्षात्मक झिल्लियों (मस्तिष्कावरण) में होने वाली सूजन होती है। यह सूजन वायरस, बैक्टीरिया तथा अन्य सूक्ष्मजीवों से संक्रमण के कारण हो सकती है साथ ही कम सामान्य मामलों में कुछ दवाइयों के द्वारा भी हो सकती है। इस सूजन के मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु के समीप होने के कारण मेनिन्जाइटिस जानलेवा हो सकती है; तथा इसीलिये इस स्थिति को चिकित्सकीय आपात-स्थिति के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
गलसुआ (गॉयटर) थॉयराइड ग्रंथि
गलगण्ड रोग ”पैरोटाइटिस’ मम्प्स” के रूप में भी जाना जाता है, एक विकट विषाणुजनित रोग है जो पैरोटिड ग्रंथि को कष्टदायक रूप से बड़ा कर देती है। ये ग्रंथियां आगे तथा कान के नीचे स्थित होती हैं तथा लार एवं थूक का उत्पादन करती हैं। गलगण्ड एक संक्रामक रोग है जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को एक विषाणु के कारण होता है जो संक्रमित लार से सम्पर्क के द्वारा फैलता है। 2 से 12 वर्ष के बीच के बच्चों में संक्रमण की सबसे अधिक सम्भावना होती है। अधिक उम्र के लोगों में, पैरोटिड ग्रंथि के अलावा, अन्य ग्रंथियां जैसे अण्डकोष, पैन्क्रियाज (अग्न्याशय) एवं स्नायु प्रणाली भी शामिल हो सकती हैं। बीमारी के विकसित होने का काल, यानि शुरुआत से लक्षण पूर्ण रूप से विकसित होने तक, 12 से 24 दिन होता है।
हैजा आंत, आहारनाल
विसूचिका या आम बोलचाल मे हैजा, जिसे एशियाई महामारी के रूप में भी जाना जाता है, एक संक्रामक आंत्रशोथ है जो वाइब्रियो कॉलेरी नामक जीवाणु के एंटेरोटॉक्सिन उतपन्न करने वाले उपभेदों के कारण होता है। मनुष्यों मे इसका संचरण इस जीवाणु द्वारा दूषित भोजन या पानी को ग्रहण करने के माध्यम से होता है। आमतौर पर पानी या भोजन का यह दूषण हैजे के एक वर्तमान रोगी द्वारा ही होता है। अभी तक ऐसा माना जाता था कि हैजे का जलाशय स्वयं मानव होता है, लेकिन पर्याप्त सबूत है कि जलीय वातावरण भी इस जीवाणु के जलाशयों के रूप में काम कर सकते हैं।
प्लूरिसी छाती
फुप्फुसावरणशोथ या प्लूरिसी (Pleurisy या pleuritis) फुफ्फुसावरण का शोथ ( inflammation) है। इसके कारण साँस लेते समय छाती में तेज दर्द हो सकता है।
काली खांसी श्वसन तंत्र
कूकर कास या कूकर खांसी या काली खांसी जीवाणु का संक्रमण होता है जो कि आरंभ में नाक और गला को प्रभावित करता है। यह प्रायः २ वर्ष से कम आयु के बच्चों की श्वसन प्रणाली को प्रभावित करता है। इस बीमारी का नामकरण इस आधार पर किया गया है कि इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति सांस लेते समय भौंकने जैसी आवाज करता है। यह बोर्डेटेल्ला परट्यूसिया कहलाने वाले जीवाणु के कारण होता है।
आर्थ्राइटीस जोड़ों की सूजन
आर्थ्राइटीस रोग एक दीर्घकालिक अवस्था है जिसके होने से जोड़ों में दर्द, सूजन और अकड़न आने लगती है। लक्षण आम तौर पर हाथ, पैर और कलाई को प्रभावित करते हैं। कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है जहाँ लक्षण बद से बदतर हो जाएँ, जिसे फ्लयेर-अप्स या फ्लेयर्स के नाम से जाना जाता है।
डिप्थीरिया गला, श्वास  नली
रोहिणी या डिप्थीरिया (Diphtheria) उग्र संक्रामक रोग है, जो 2 से लेकर 10 वर्ष तक की आयु के बालकों को अधिक होता है, यद्यपि सभी आयुवालों को यह रोग हो सकता है। इसका उद्भव काल (incubation period) दो से लेकर चार दिन तक का है। रोग प्राय: गले में होता है और टॉन्सिल भी आक्रांत होते हैं। स्वरयंत्र, नासिका, नेत्र तथा बाह्य जननेंद्रिय भी आक्रांत हो सकती हैं।
पार्किंसन मस्तिष्क
पार्किसन रोग से तात्पर्य ऐसे मानसिक रोग से है, जिसमें मानव शरीर में कपकपी, कठोरता, चलने में परेशानी होना, संतुलन और तालमेल इत्यादि समस्याएँ होती हैं। पार्किसन रोग की शुरूआत सामान्य बीमारी की तरह होती है, जो कुछ समय के बाद गंभीर रूप ले लेती है।
प्लेग फेफड़े, लाल रक्त कणिकाएं
ताऊन या प्लेग (Plague) संसार की सबसे पुरानी महामारियों में है। इसे ताऊन, ब्लैक डेथ, पेस्ट आदि नाम भी दिए गए हैं। मुख्य रूप से यह कृतंक (rodent) प्राणियों (प्राय: चूहे) का रोग है, जो पास्चुरेला पेस्टिस नामक जीवाणु द्वारा उत्पन्न होता है। आदमी को यह रोग प्रत्यक्ष संसर्ग अथवा पिस्सू के दंश से लगता है। यह तीव्र गति से बढ़ता है, बुखार तेज और लसीका ग्रंथियाँ स्पर्शासह्य एवं सूजी होती हैं, रक्तपुतिता की प्रवृत्ति होती है और कभी-कभी यह न्यूमोनिया का रूप धारण करता है। भारी पैमाने पर तबाही मचाने के कारण पूरे इतिहास में प्लेग कुख्यात रही है आज भी विश्व के कुछ भागों में प्लेग महामारी बना हुआ है।
हेपेटाइटिस-बी यकृत
यकृतशोथ ख (हेपाटाइटिस बी) हेपाटाइटिस बी वायरस (HBV) के काऱण होने वाली एक संक्रामक बीमारी है जो मनुष्य के साथ बंदरों की प्रजाति के लीवर को भी संक्रमित करती है, जिसके कारण लीवर में सूजन और जलन पैदा होती है जिसे हेपाटाइटिस कहते हैं। मूलतः, “सीरम हेपेटाइटिस” के रूप में ज्ञात इस बीमारी के कारण एशिया और अफ्रिका में महामारी पैदा हो चुकी है और चीन में यह स्थानिक मारक है।
दस्त बड़ी आँत
अतिसार या डायरिया (Diarrhea) में या तो बार-बार मल त्याग करना पड़ता है या मल बहुत पतले होते हैं या दोनों ही स्थितियां हो सकती हैं। पतले दस्त, जिनमें जल का भाग अधिक होता है, थोड़े-थोड़े समय के अंतर से आते रहते हैं।
सुजाक, श्वेत प्रदर मूत्र मार्ग
सूजाक एक संक्रामक यौन रोग (यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) है। सूजाक नीसेरिया गानोरिआ नामक जीवाणु से होता है जो महिला तथा पुरुषों में प्रजनन मार्ग के गर्म तथा गीले क्षेत्र में आसानी और बड़ी तेजी से बढ़ती है। इसके जीवाणु मुंह, गला, आंख तथा गुदा में भी बढ़ते हैं। उपदंश की तरह यह भी एक संक्रामक रोग है अतः उन्ही स्त्री-पुरुषों को होता है जो इस रोग से ग्रस्त व्यक्ति से यौन संपर्क करते हैं।
छाले होना गला व मुंह
मुंह में छाले होना एक सामान्य स्वास्थ्य समस्या है. अधिकतर मामलों में कुछ दिनों में ये अपने आप ही ठीक हो जाते हैं. लेकिन कई लोग अक्सर होने वाले मुंह के छालों से परेशान रहते हैं. इनमें बहुत दर्द भी होता है और कई बार यह समस्या इतनी गंभीर हो जाती है कि बोलने और खाने में भी परेशानी होती है. वैसे 25-35 वर्ष के आयुवर्ग के लोगों को यह समस्या अधिक होती है, लेकिन ऐसा नहीं है किसी को किसी भी उम्र में मुंह में छाले नहीं हो सकते हैं.
मेनिन्ज़ाइटिस रीढ़ की हड्डी तथा मस्तिष्क
तानिकाशोथ या मस्तिष्कावरणशोथ या मेनिन्जाइटिस (Meningitis) मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु को ढंकने वाली सुरक्षात्मक झिल्लियों (मस्तिष्कावरण) में होने वाली सूजन होती है। यह सूजन वायरस, बैक्टीरिया तथा अन्य सूक्ष्मजीवों से संक्रमण के कारण हो सकती है साथ ही कम सामान्य मामलों में कुछ दवाइयों के द्वारा भी हो सकती है।
काला अजार रुधिर, प्लीहा व अस्थि मज्जा
कालाजार धीरे-धीरे विकसित होने वाला एक देशी रोग है जो एक कोशीय परजीवी या जीनस लिस्नमानिया से होता है। कालाजार के बाद डरमल लिस्नमानियासिस (पीकेडीएल) एक ऐसी स्थिति है जब लिस्नमानिया त्वचा कोशाणुओं में जाते हैं और वहां रहते हुए विकसित होते हैं। यह डरमल लिसियोन के रूप में तैयार होते हैं। कई कालाजार में कुछ वर्षों के उपचार के बाद पी के डी एन प्रकट होते हैं।

इन्हें भी पढ़े: विषाणु और जीवाणु द्वारा मनुष्य मे होने वाले रोग

नीचे दिए गए प्रश्न और उत्तर प्रतियोगी परीक्षाओं को ध्यान में रख कर बनाए गए हैं। यह भाग हमें सुझाव देता है कि सरकारी नौकरी की परीक्षाओं में किस प्रकार के प्रश्न पूछे जा सकते हैं। यह प्रश्नोत्तरी एसएससी (SSC), यूपीएससी (UPSC), रेलवे (Railway), बैंकिंग (Banking) तथा अन्य परीक्षाओं में भी लाभदायक है।

महत्वपूर्ण प्रश्न और उत्तर (FAQs):

प्रश्न: खसरा, चेचक, गलसुआ (मम्प्स), रैबीज रोगों के होने का कारण क्या है?
उत्तर: विषाणु (Exam - SSC CGL Jul, 2014)
प्रश्न: आयोडीन की कमी से कौन-सा रोग होता है?
उत्तर: घेंघा (Exam - SSC CGL Apr, 2014)
प्रश्न: 'बर्ड फ्लू रोग मनुष्यों को प्रभावित करता है। यह किसके माध्यम से फैलता है?
उत्तर: मुर्गी (Exam - SSC MTS Feb, 2014)
प्रश्न: निकट दृष्टि (मायोपिया) रोग का संबंध किससे है?
उत्तर: आँख से (Exam - SSC MTS Feb, 2014)
प्रश्न: पशुओं में पैर और मुख रोग का क्या कारण है?
उत्तर: वाइरस (Exam - SSC MTS Feb, 2014)
प्रश्न: मलोरिया रोग का वाहक कीट कौन-सा है?
उत्तर: मादा एनॉफिलीज मच्छर (Exam - SSC STENO G-CD Dec, 2013)
प्रश्न: नींद की बीमारी' के लिए कौन-सा रोगवाहक कीट उत्तरदायी है?
उत्तर: सीसी मक्खी (Exam - SSC CHSL Nov, 2013)
प्रश्न: पेलैजिया रोग किस पोषक तत्व की कमी से होता है?
उत्तर: नियासीन (Exam - SSC CHSL Oct, 2013)
प्रश्न: डैल्टोनिज्म (प्रोटेनोपिया) एक प्रकार की वर्णाधता है, उसमें रोगी कौन-सा रंग नहीं देख पाता?
उत्तर: लाल रंग (Exam - SSC CHSL Oct, 2013)
प्रश्न: मादा ऐनोफेलीज मच्छर किस रोग का वाहक है?
उत्तर: मलेरिया (Exam - SSC CHSL Oct, 2013)


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