लाल बहादुर शास्त्री का जीवन परिचय एवं उनसे जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी

इस अध्याय के माध्यम से हम जानेंगे लाल बहादुर शास्त्री (Lal Bahadur Shastri) से जुड़े महत्वपूर्ण एवं रोचक तथ्य जैसे उनकी व्यक्तिगत जानकारी, शिक्षा तथा करियर, उपलब्धि तथा सम्मानित पुरस्कार और भी अन्य जानकारियाँ। इस विषय में दिए गए लाल बहादुर शास्त्री से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को एकत्रित किया गया है जिसे पढ़कर आपको प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने में मदद मिलेगी। Lal Bahadur Shastri Biography and Interesting Facts in Hindi.

लाल बहादुर शास्त्री का संक्षिप्त सामान्य ज्ञान

नामलाल बहादुर शास्त्री (Lal Bahadur Shastri)
जन्म की तारीख02 अक्टूबर 1904
जन्म स्थानमुगलसराय, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
निधन तिथि11 जनवरी 1966
माता व पिता का नामरामदुलारी / मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव
उपलब्धि1966 - मरणोपरांत 'भारत रत्न' से सम्मानित प्रथम साहित्यकार
पेशा / देशपुरुष / राजनीतिज्ञ / भारत

लाल बहादुर शास्त्री (Lal Bahadur Shastri)

लाल बहादुर शास्त्री स्वतंत्र भारत के दूसरे प्रधानमंत्री एवं स्वतंत्रता सेनानी थे। वह 09 जून 1964 से 11 जनवरी 1966 तक लगभग 18 महीने देश के प्रधानमंत्री रहे। शारीरिक कद में छोटे होने के बावजूद भी वह महान साहस और इच्छाशक्ति के व्यक्ति थे। वर्ष 1966 में लाल बहादुर शास्त्री को उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिये मरणोपरान्त देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न‘ से सम्मानित किया गया था।

लालबहादुर शास्त्री का जन्म 02 अक्टूबर 1904 में मुगलसराय, वाराणसी (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उनके पिता का नाम मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव और उनकी माता का नाम रामदुलारी था। इनके पिता प्राथमिक विद्यालय में एक शिक्षक थे और इसी कारण से सब उन्हें मुंशीजी ही कहते थे। बाद में उन्होंने राजस्व विभाग में लिपिक (क्लर्क) की नौकरी की थी। परिवार में सबसे छोटा होने के कारण बालक लालबहादुर को परिवार वाले प्यार में नन्हें कहकर ही बुलाया करते थे।
लाल बहादुर शास्त्री का निधन 11 जनवरी 1966 (उम्र 61) को ताशकन्द समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद उसी रात इनकी मृत्यु हो गयी। इनकी मृत्यु का कारण हार्ट अटैक बताया गया। परन्तु इनकी मृत्यु को लेकर तरह-तरह के कयास लगाये जाते रहे। इनके परिवार के लोगो का कहना था की इनकी मृत्यु हार्ट से नहीं बल्कि जहर देने से हुई थी यह विवाद आजतक पता नहीं चला।
शास्त्री जी के परिवार में, कई कायस्थ परिवारों के साथ, यह उस युग में बच्चों के लिए उर्दू भाषा और संस्कृति में शिक्षा प्राप्त करने का रिवाज था। ऐसा इसलिए है क्योंकि उर्दू / फ़ारसी सदियों से सरकार की भाषा थी, अंग्रेजी द्वारा प्रतिस्थापित होने से पहले, और पुरानी परंपराएं 20 वीं शताब्दी में बनी रहीं। इसलिए, शास्त्री ने चार साल की उम्र में मुगलसराय के पूर्व मध्य रेलवे इंटर कॉलेज में एक मौलवी (एक मुस्लिम मौलवी), बुरहान मियां के संरक्षण में शिक्षा शुरू की। उन्होंने वहां छठी कक्षा तक पढ़ाई की। 1917 में, बिंदेश्वरी प्रसाद (जो अब घर के मुखिया थे) को वाराणसी स्थानांतरित कर दिया गया था, और पूरा परिवार रामदुलारी देवी और उनके तीन बच्चों सहित वहां चला गया। वाराणसी में, शास्त्री हरीश चंद्र हाई स्कूल में सातवीं कक्षा में शामिल हुए। इस समय, उन्होंने "श्रीवास्तव" (जो कायस्थ परिवारों की एक उप-जाति के लिए एक पारंपरिक उपनाम है) के अपने जाति-व्युत्पन्न उपनाम को छोड़ने का फैसला किया।
संस्कृत भाषा में स्नातक स्तर तक की शिक्षा समाप्त करने के बाद लाल बहादुर शास्त्री भारत सेवक संघ से जुड़ गये और देशसेवा का व्रत लेते हुए यहीं से अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत की। शास्त्रीजी सच्चे गान्धीवादी थे जिन्होंने अपना सारा जीवन सादगी से बिताया और उसे गरीबों की सेवा में लगाया। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सभी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों व आन्दोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही और उसके परिणामस्वरूप उन्हें कई बार जेलों में भी रहना पड़ा। स्वाधीनता संग्राम के जिन आन्दोलनों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही उनमें 1921 का असहयोग आंदोलन, 1930 का दांडी मार्च तथा 1942 का भारत छोड़ो आन्दोलन उल्लेखनीय हैं। दूसरे विश्व युद्ध में इंग्लैण्ड को बुरी तरह उलझता देख जैसे ही नेताजी ने आजाद हिन्द फौज को "दिल्ली चलो" का नारा दिया, गान्धी जी ने मौके की नजाकत को भाँपते हुए 8 अगस्त 1942 की रात में ही बम्बई से अँग्रेजों को "भारत छोड़ो" व भारतीयों को "करो या मरो" का आदेश जारी किया और सरकारी सुरक्षा में यरवदा पुणे स्थित आगा खान पैलेस में चले गये। 9 अगस्त 1942 के दिन शास्त्रीजी ने इलाहाबाद पहुँचकर इस आन्दोलन के गान्धीवादी नारे को चतुराई पूर्वक "मरो नहीं, मारो!" में बदल दिया और अप्रत्याशित रूप से क्रान्ति की दावानल को पूरे देश में प्रचण्ड रूप दे दिया। पूरे ग्यारह दिन तक भूमिगत रहते हुए यह आन्दोलन चलाने के बाद 19 अगस्त 1942 को शास्त्रीजी गिरफ्तार हो गये। शास्त्रीजी के राजनीतिक दिग्दर्शकों में पुरुषोत्तमदास टंडन और पण्डित गोविंद बल्लभ पंत के अतिरिक्त जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे। सबसे पहले 1929 में इलाहाबाद आने के बाद उन्होंने टण्डनजी के साथ भारत सेवक संघ की इलाहाबाद इकाई के सचिव के रूप में काम करना शुरू किया। इलाहाबाद में रहते हुए ही नेहरूजी के साथ उनकी निकटता बढ़ी। इसके बाद तो शास्त्रीजी का कद निरन्तर बढ़ता ही चला गया और एक के बाद एक सफलता की सीढियाँ चढ़ते हुए वे नेहरूजी के मंत्रिमण्डल में गृहमन्त्री के प्रमुख पद तक जा पहुँचे। और इतना ही नहीं, नेहरू के निधन के पश्चात भारतवर्ष के प्रधान मन्त्री भी बने।
शास्त्री जीवन भर अपनी ईमानदारी और विनम्रता के लिए जाने जाते थे। उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया था, और दिल्ली में उनके लिए एक स्मारक "विजय घाट" बनाया गया था। लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (मसूरी, उत्तराखंड) सहित कई शिक्षण संस्थान उनके नाम पर हैं। 2011 में, शास्त्री की 45 वीं पुण्यतिथि पर, उत्तर प्रदेश सरकार ने वाराणसी के रामनगर में शास्त्री के पैतृक घर के नवीनीकरण की घोषणा की और इसे एक जीवनी संग्रहालय में बदलने की योजना की घोषणा की। वाराणसी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम उनके नाम पर रखा गया है।

📅 Last update : 2022-01-11 00:31:18

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