गोविन्द शंकर कुरुप का जीवन परिचय एवं उनसे जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी

✅ Published on February 2nd, 2019 in पुरस्कारों के प्रथम प्राप्तकर्ता, प्रसिद्ध व्यक्ति

इस अध्याय के माध्यम से हम जानेंगे गोविन्द शंकर कुरुप (Govind Shankar Kurup) से जुड़े महत्वपूर्ण एवं रोचक तथ्य जैसे उनकी व्यक्तिगत जानकारी, शिक्षा तथा करियर, उपलब्धि तथा सम्मानित पुरस्कार और भी अन्य जानकारियाँ। इस विषय में दिए गए गोविन्द शंकर कुरुप से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को एकत्रित किया गया है जिसे पढ़कर आपको प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने में मदद मिलेगी। Govind Shankar Kurup Biography and Interesting Facts in Hindi.

गोविन्द शंकर कुरुप के बारे में संक्षिप्त जानकारी

नामगोविन्द शंकर कुरुप (Govind Shankar Kurup)
उपनाममहाकवि जी
जन्म की तारीख03 जून 1901
जन्म स्थाननेथोड,कोचीन
निधन तिथि02 फरवरी 1978
माता व पिता का नामवदक्कानी मरारत लक्ष्मीकुट्टी मरसियार / नेल्लिक्कपिल्ली वारायत शंकरा वारियर
उपलब्धि1965 - भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रथम साहित्यकार
पेशा / देशपुरुष / साहित्यकार / भारत

गोविन्द शंकर कुरुप (Govind Shankar Kurup)

गोविन्द शंकर कुरुप या जी शंकर कुरुप मलयालम भाषा के प्रसिद्ध कवि थे। उनकी प्रसिद्ध रचना ‘ओटक्कुष़ल" अर्थात ‘बाँसुरी" भारत सरकार द्वारा दिए जाने वाले साहित्य के सर्वोच्च सम्मान ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार"से सम्मानित हुई थी। ‘महाकवि" गोविंद शंकर कुरुप की 40 से अधिक मौलिक और अनूदित कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। , जिसमें 25 काव्यशास्त्र, लघु कथाएँ, संस्मरण, नाटक और गद्य शामिल हैं इसके पश्चात भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया ।

गोविन्द शंकर कुरुप का जन्म

गोविन्द शंकर कुरुप का जन्म 03 जून 1901 में कोचीन (अब एरनाकुलम जिला, केरल, भारत) में हुआ था। इनके पिता का नाम शंकर वार्रिअर और इनकी माता का नाम लक्ष्मीकुट्टी अम्मा था। बचपन में ही पिता का देहांत हो जाने के कारण उनका लालन-पालन मामा ने किया था| इनके मामा एक ज्योतिषी और पंडित थे

गोविन्द शंकर कुरुप की शिक्षा

उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा पेरुंपावूर के मलयालम मिडिल स्कूल से प्राप्त की थी। उन्होंने कोचीन राज्य की पंडित परीक्षा पास करके बांग्ला और मलयालम के साहित्य का अध्ययन किया।

गोविन्द शंकर कुरुप का करियर

शंकर कुरुप ने कोचीन राज्य की ‘पंडित" परीक्षा पास करके अध्यापन की योग्यता प्राप्त की थी। वह दो वर्ष तक यहाँ-वहाँ अध्यापन का काम भी करते रहे। गोविन्द शंकर कुरुप ने वर्ष 1918 में अपनी पहली कविता ‘प्रकृति को नमस्कार" प्रकाशित की था। उनके कविता संग्रह, साहित्य कौतुकम् के पहले भाग की कुछ कविताएँ इसी काल की हैं। पर अपना अभीष्ट उन्हें तब प्राप्त हुआ, जब वह तिरूविल्वामला हाई स्कूल में अध्यापक नियुक्त हुए। 1921 से 1925 तक शंकर कुरुप तिरूविल्वामला में रहें। प्रकृति के प्रति प्रारंभ में जो एक सहज आकर्षण भाव था, उसने इन चार वर्षों में अन्नय उपासक की भावना का रूप ले लिया। तिरूविल्वामला से कुरुप 1925 में चालाकुटि हाईस्कूल पहुंचे। उसी वर्ष "साहित्य कौतुकम" का दूसरा भाग प्रकाशित हुआ। 1931 में "नालें" शीर्षक कविता के प्रकाशन ने साहित्य जगत् में एक हलचल-सी मचा दी। कुछ लोगों ने उसे राजद्रोहात्मक तक कहा और उसके कारण "महाराजा कॉलेज", एर्णाकुलम में प्राध्यापक पद पर उनकी नियुक्ति में भी एक बार बाधा आई। 1937 से 1956 में सेवानिवृत्त होने तक इस कॉलेज में वह मलयालम के प्राध्यापक रहे। यहाँ अवकाश प्राप्त कर लेने के उपरांत वह आकाशवाणी के त्रिवेंद्रम केंद्र में प्रोड्यूसर रहे। गोविंद शंकर कुरुप की काव्य कृति "ओट्क्कुषठ" का प्रथम संस्करण वर्ष 1950 में प्रकाशित हुआ था। इसके मूल रूप में 60 कविताएँ थीं। वर्तमान रूप में 58 कविताएँ हैं।

गोविन्द शंकर कुरुप के बारे में अन्य जानकारियां

महाकवि" गोविंद शंकर कुरुप की 40 से अधिक मौलिक और अनूदित कृतियाँ प्रकाशित है। उनके लिखे कुछ कविता संग्रह निम्नलिखित हैं- साहित्य कौतुकम, चार खंड (1923-1929), सूर्यकांति (1932), ओट्क्कुषठ (1950), अंतर्दाह (1953), विश्वदर्शनम (1960), जीवनसंगीतम् (1964), पाथेयम (1961), गद्य-गद्योपहारम् (1940), लेखमाल (1943) और उनके द्वारा लिखे गए प्रमुख नाटक कुछ इस प्रकार हैं- संध्य (1944), इरूट्टिनु मुंपु (1935)

गोविन्द शंकर कुरुप के पुरस्कार और सम्मान

शंकर कुरुप को 1961 में कविता के लिए केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, जो कि उनके पुराण, विश्वदर्शनम के लिए था। केंद्रीय साहित्य अकादमी ने उन्हें 1963 में कविता के लिए उनके वार्षिक पुरस्कार से सम्मानित किया। वह भारत के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार ज्ञानपीठ पुरस्कार के पहले विजेता थे, जब यह पुरस्कार 1965 में स्थापित किया गया था। उन्होंने अपनी पौराणिक कथाओं के लिए पुरस्कार प्राप्त किया, ओड़कुझल (बांस) बांसुरी) जो 1950 में प्रकाशित हुई थी; उन्होंने 1968 में ओडक्कुज़ल पुरस्कार स्थापित करने के लिए पुरस्कार राशि का एक हिस्सा अलग रखा और बाद में काम का हिंदी में अनुवाद किया गया, जिसका शीर्षक था, बंसुरी। 1967 में, उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार मिला और एक साल बाद, भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया। इंडिया पोस्ट ने 2003 में, ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेताओं की श्रृंखला के तहत कुरुप पर एक स्मारक डाक टिकट जारी किया।

भारत के अन्य प्रसिद्ध साहित्यकार

व्यक्तिउपलब्धि
सुमित्रानंदन पंत की जीवनीज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रथम हिंदी साहित्यकार
बालकृष्ण शर्मा की जीवनीसाहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में 'पद्म भूषण' पुरस्कार से सम्मानित

नीचे दिए गए प्रश्न और उत्तर प्रतियोगी परीक्षाओं को ध्यान में रख कर बनाए गए हैं। यह भाग हमें सुझाव देता है कि सरकारी नौकरी की परीक्षाओं में किस प्रकार के प्रश्न पूछे जा सकते हैं। यह प्रश्नोत्तरी एसएससी (SSC), यूपीएससी (UPSC), रेलवे (Railway), बैंकिंग (Banking) तथा अन्य परीक्षाओं में भी लाभदायक है।

महत्वपूर्ण प्रश्न और उत्तर (FAQs):

प्रश्न: प्रकृति को नमस्कार कविता कब प्रकशित हुई थी?
उत्तर: 1918
प्रश्न: गोविन्द शंकर कुरुप की पहली कविता कौन-सी थी?
उत्तर: प्रकृति को नमस्कार
प्रश्न: भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रथम साहित्यकार कौन थे?
उत्तर: गोविन्द शंकर कुरुप
प्रश्न: गोविन्द शंकर कुरुप को सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार से कब सम्मानित क्या गया था?
उत्तर: 1967
प्रश्न: वर्ष 1968 में पद्म भूषण से किसे नवाज़ा गया था?
उत्तर: गोविन्द शंकर कुरुप

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